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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

ओद्योगिक तिलहन-अलसी की आधुनिक खेती

                                                अलसी: तेल और रेशे वाली फसल 

डाँ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्राध्यापक (सस्य विज्ञान विभाग)
इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

       अलसी एक तिलहनी एवं रेशेदार फसल है। ठण्डे देशो  में अलसी के पौधो  के तने से एक प्रकार का रेशा भी निकाला जाता है, जिसे फ्लेक्स कहते है । भारत में अलसी की खेती मुख्यतः तेल के लिए ही की जाती है। इसके बीज में 33 से 44 प्रतिशत तेल और 20.3 प्रतिशत प्रोटीन तथा 4.8 प्रतिशत रेशा पाया जाता है। अलसी के तेल में 50-57 प्रतिशत लिनोलिक अम्ल पाया जाता है। अलसी का तेल शीघ्र सूखने वाला होता है। अतः तेल का उपयोग पेंट, वार्निश, साबुन, रंग, स्याही आदि बनाने में किया जाता है। अलसी के तेल क¨ खाद्य तेल के रूप में उपयोग करने  में लोगो  की रूचि बढ़ रही है क्योकि इसके तेल में ओमेगा-3 फैटी एसिड (लिनो ली निक अम्ल) बड़े पैमाने पर पाया जाता है जो  कि स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभकारी बताया जाता है । इसकी खली में लगभग 30 प्रतिशत प्रोटीन, 7 प्रतिशत वसा, 42 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 10 प्रतिशत रेशा और  7 प्रतिशत खनिज पाया जाता है , जिससे यह पशुओ  के लिए सबसे उत्तम खली (केक) मानी जाती है ।  पौधों के तने से रेशे भी निकाले जाते हैं जिससे लिनेन फाइबर  तैयार किया जाता है। इनका प्रयोग दरी, कैनवास तथा मोटे कपड़े बनाने में किया जाता है। रेशे निकालने के बाद बचे हुए तने का कड़ा भाग सिगरेट में प्रयोग होने वाले कागज बनाने के काम में आता है।

उपयुक्त जलवायु

             अलसी की खेती बीज और तेल के उद्देश्य से अधो-उष्ण कटिबन्धीय  और शीतोष्ण कटिबन्धीय देशों में की जाती है। ठंडे देशों में इसे बहुधा रेशे  के लिए उगाया जाता है। अलसी की खेती के लिए साधारणतया ठण्डी और शुष्क जलवायु की आवश्कता होती है। अलसी की फसल रबी मौसम (शरद काल) में ली जाती हैं । सामान्यतः 80 - 100 सेमी. वार्षिक वर्षा अलसी की खेती के लिए उपयुक्त रहती है। इसकी अच्छी फसल के लिए 21-27 डि से तापक्रम उत्तम रहता है। जीवन काल के आरम्भ में अधिक तापमान होने से पौध  रोगी हो  जाते है । फसल वृद्धिकाल या फूल आने के समय पाले का पड़ना अत्यधिक हाँनिकारक होता है। रेशा उत्पादन करने वाली किस्मो  के लिए ठंडा और  आद्र वातावरण अच्छा माना जाता है ।फसल पकने के समय दाना एवं रेशा वाली दोनों  ही किस्मो को  अपेक्षाकृत अधिक तापक्रम तथा शुष्क वातावरण की आवश्यक होती है।

भूमि का चयन 

    अलसी की उत्तम खेती के लिए मध्यम उपजाऊ दोमट मृदा  सर्वोत्तम होती है। वर्षा ऋतु के बाद संचित नमी से ही ख्¨ती ह¨ने का कारण अलसी को  भारी मटियार या दोमट भूमि मे ही बोया जाता  है। मध्य प्रदेश में इसकी खेती कपास की काली मिट्टियों  में की जाती है।  यदि ऊपर की मिट्टी दोमट तथा नीचे की मटियार है  तो  फसल अच्छी ह¨ती है । उतेरा पद्धति (धान की खड़ी फसल मे बीज बोना) के लिए धान के भारी खेत, जिसमें नमी अधिक समय ते संचित रहती हैं, उपयुक्त रहती है। मृदा का पीएच मान उदासीन होना चाहिए। खेत में जलनिकास का उत्तम प्रबन्ध होना अनिवार्य है।

भूमि की तैयारी

    बीज के अंकुरण और उचित पौध  वृद्धि के लिए आवश्यक है कि बुआई से पूर्व भूमि को अच्छी प्रकार से तैयार कर लिया जाए। धान की फसल कटाई पश्चात् बतर आने पर खेत की  मिट्टी पलटने वाले हल से एक बार जोतने के पश्चात् 2-3 बार देशी 2-3 बार देशी या हैरो चलाकर भूमि तैयार की जाती है। जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए जिससे भूमि में नमी संचित हो सके। उतेरा बोनी हेतु धान के खेतों में समय-समय पर खरपतवार निकालकर खेतों को इनसे साफ रखना चाहिये।

बोआई का समय

    फसल का जल्दी बोना  अच्छी पैदावार के लिए लाभदायक पाया गया है। प्रायः ऐसा माना जाता है कि अच्छी प्रकार से तैयार की गई भूमि में उचित समय एवं सही तरीके से फसल को  बो  देने मात्र  से ही सफलता का आधा रास्ता तय हो  जाता है । सामान्यतौर पर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से लेकर मध्य नवम्बर तक बुआई की जाती है। असिंचित दशा  में अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े तक बुआई कर लेनी चाहिये। देर से फसल बोने पर गेरूआ , बुकनी रोग तथा अलसी की मक्खी द्वारा फसल को काफी नुकसान होता है। छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश में धान की खड़ी फसल में अलसी की बुआई (उतेरा) सामान्य समय से एक माह पूर्व ही कर दी जाती है। मिलवां खेती में अलसी मुख्य फसल के साथ ही बोई जाती है ।

उन्नत किस्में

           अलसी की देशी किस्मों की उपज क्षमता कम होती है क्योंकि इन पर कीट तथा रोगों का प्रकोप अधिक होता है। अतः अधिकतम उपज लेने के लिए देशी किस्मों के स्थान पर उन्नत किस्मों के प्रमाणित बीज का उपयोग करना चाहिए। क्षेत्र  विशेष के लिए जारी की गई किस्मो  को  उसी क्षेत्र में उगाया जाना चाहिए, अन्यथा जलवायु संबंधी अंतर होने के कारण भरपूर उपज नहीं मिल सकेगी । 
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित अलसी की नवीन उन्नत किस्मो  की विशेषताएं
1. दीपिका: इस किस्म की पकने की अवधि 112 - 115 दिन, औसत उपज 12 - 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा बीज में तेल का अंश 42 % होता है। अनुमोदित उर्वरक देने पर 20.44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। इसके बीज मध्यम आकार (1000 दानों का भार 6.2 ग्राम) के होते हैं। यह अर्द्ध-सिंचित व उतेरा खेती के लिए उपयुक्त है। यह किस्म म्लानि (विल्ट) और रतुआ (रस्ट) रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधक है।
2. इंदिरा अलसी- 32: यह 100 - 105 दिन में पकने वाली किस्म है जिससे 10 - 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। बीज हल्के कत्थई के मध्यम आकार (100 दानों का भार 6.5 ग्राम) के होते हैं। इसके बीज में तेल की अंश 39.3 % होता है। यह चूर्णिल आसिता रोग के प्रति मध्यम रोधी परन्तु म्लानि, आल्टरनेरिया झुलसा रोगों के प्रति सहिष्णु किस्म है। असिंचित दशा और उतेरा खेती के लिए उपयुक्त है।
3. कार्तिक (आरएलसी - 76): यह किस्म 98 - 104 दिन में तैयार हो जाती है तथा औसतन 12 - 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। इसके बीज हल्के कत्थई रंग तथा मध्यम आकार (100 दानों का भार 5.5 ग्राम) के होते हैं। बीज में तेल 43%  तेल पाया जाता है यह किस्म प्रमुख रोग व वड फ्लाई कीट के प्रति मध्यम रोधी है तथा सिंचित व अर्द्ध सिंचित दशा में खेती हेतु उपयुक्त है।
4. किरण: अलसी की यह किस्म 110 - 115 दिन में तैयार होती है। औसतन 12 - 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज क्षमता तथा बीज में 43 %  तेल पाया जाता है। बीज चमकीला कत्थई रंग का बड़ा (100 दानों का भाग 6.2 ग्राम) होता है। यह रतुआ, म्लानि व चूर्णिला आसिता रोग प्रतिरोधक किस्म है। मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की सिंचित दशाओं में खेती के लिए उपयुक्त हैं।
5. आरएलसी - 92: यह किस्म 110 दिन में पक कर तैयार हो जाती है तथा औसतन 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है। इसके बीज कत्थई रंग तथा बड़े (100 दानों का भाग 6.8 ग्राम) के होते हैं। बीज में तेल 42% तक पाया जाता है। यह चूर्णिल आसिता, म्लानि रोग प्रतिरोधी व वड फ्लाई कीट सहनशील है। देर से बोने व उतेरा खेती हेतु उपयुक्त किस्म है।
अलसी की अन्य उन्नत किस्मो  की विशेषताएं
1. जवाहर-17 (आर.17): इसका फूल नीला, बीज बड़ा  तथा बादामी रंग का होता है। इसमें फूल कम समय में एक साथ निकलते हैं और पौधे भी एक साथ पककर तैयार हो जाते हैं। अलसी की मक्खी से इसको कम नुकसान तथा गेरूआ रोग का भी असर नहीं होता है। यह जाति 115 - 123 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 46.3 प्रतिशत होती है। प्रति हेक्टेयर पैदावार 11.25 - 11.50 क्विंटल होती है। सम्पूर्ण म.प्र. के लिए उपयुक्त है।
2. जवाहर-23: इसके बीज मध्यम आकार के व भूरे होते हैं। यह चूर्णिल आसिता रोधी तथा म्लानि व रतुआ के प्रति भी पर्याप्त रोधिता है। यह जाति 115 - 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 43 प्रतिशत होती है। प्रति हेक्टेयर पैदावार 10- 11 क्विंटल होती है। सम्पूर्ण म.प्र. के लिए उपयुक्त है।
3.जवाहर-552: यह किस्म 115-120 दिन में पककर तैयार होती है जिसकी उपज क्षमता 9-10 क्विंटल प्रति हैक्टर आंकी गई है । इसके बीज में 44 प्रतिशत तेल पाया जाता है । म.प्र. व छत्तीसगढ़ की असिंचित पद्धति के लिए उपयोगी है ।
द्वि-उद्देश्य (दाना व रेशा) वाली उन्नत किस्में
1.जीवनः यह किस्म 177 दिन में तैयार होकर 10.90 क्विंटल बीज और 11.00 क्विंटल रेशा प्रति हेक्टेयर तक देती है।
2.गौरवः यह किस्म 137 दिन मे पक कर तैयार होती है। औसतन 10.50 क्विंटल बीज और 9.50 क्विंटल  रेशा प्रति हेक्टेयर देती है।

बीज एवं बुआई

    बीज की मात्रा  बोने की दूरी, बीज के भार और  अंकुरण शक्ति, भूमि, जलवायु आदि पर निर्भर करती है । सामान्यतौर पर अलसी की पंक्तियों में बुआई के लिए 25 - 30 किलो प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता पड़ती है।  बीज छोटा होने के कारण कहीं-कहीं इसे बारीक  गोबर की खाद, राख या मिट्टी के साथ मिलाकर बोते है, जिससे खेत में सम रूप से  बोआई हो  सके । बीज सदैव प्रमाणित तथा कवकनाशी रसायन जैसे थाइरम या कैप्टन 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित करके बोना चाहिए। अलसी की ब¨आई हल के पीछे कूँड़ में , चोगे द्वारा कतार  में या बीज छिटक  कर की जाती है । परन्तु हल के पीछे कूँड़  विधि से बोआई सवर्¨त्तम मानी जाती है। बुआई सदैव पंक्तियों  में ही करना चाहिए। इससे सस्य क्रियाएँ करने में आसानी रहती है। बुआई हेतु पंक्ति-से-पंक्ति की दूरी 25 से 30 सेमी. रखनी चाहिए ध्यान रखें कि बीज 3 - 4 सेमी. से अधिक की गहराई पर न पड़े। पौधे-से-पौधे की दूरी 5-6 सेमी. रखते हैं जो कि अंकुरण पश्चात् निंदाई के समय पौध विरलन  से स्थापित की जाती है। बीज एवं रेशा दोनों एक साथ देने वाली किस्मों में बीज दर अपेक्षाकृत अधिक रखी जाती है। रेशा वाली किस्में कम दूरी पर बोयी जाती है । सिंचाई वाले क्षेत्रों  में बोआई  होते ही खेत को  क्यारियो  में काट लिया जाता है जिससे सिंचाई करने में सुविधा रहे ।

उतेरा पद्धति से अलसी की खेती

         अलसी की फसल को धान की खड़ी फसल में छिटककर बोने की विधि  को छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश में उतेरा तथा बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर प्रदेश में पैरा विधि कहते हैं। धान के खेत की उपलब्ध नमी  का समुचित उपयोग करने के लिए यह एक अच्छी पद्धति है। भारत वर्ष में कुल अलसी क्षेत्रफल का लगभग 25 से 30 प्रतिशत क्षेत्रफल उतेरा के अनतर्गत आता है। सामान्यतौर पर इस पद्धति में अलसी की खेती असिंचित दशा, अपर्याप्त पोषण और बिना पौध संरक्षण के होती है, इसलिये इसकी उपज अत्यन्त कम (4-5 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर ) होती है। प्रस्तुत उन्नत विधि से खेती करने पर उतेरा पद्धति से भी अच्छी उपज ली जा सकती है।
    उतेरा के लिए अनुमोदित किस्मों (जवाहर-7, जवाहर-552 आदि) के बीज का प्रयोग करना चाहिए। उतेरा विधि भारी मृदाओं में जिनमें जल धारण करने की पर्याप्त क्षमता  हो अपनाना चाहिए। उतेरा लेने के लिए धान की फसल में गोबर की खाद या हरी खाद तथा फास्फेटिक उर्वरकों का समुचित उपयोग करना चाहिए। अलसी बोने से 3 दिन पहले धान की खड़ी फसल में 10 - 20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से नाइट्रोजन उर्वरक का छिड़काव करना चाहिए। उतेरा के लिए प्रति हेक्टेयर 35 -40 किग्रा. बीज का उपयोग करना चाहिए। उतेरा बोने का समय तथा धान के पकने का समय में जितना कम समय हो उतना ही अधिक फायदा धान व उतेरा फसल को होता है। अच्छी फसल के लिये 15 अक्टूबर तक अर्थात् धान की दुग्धावस्था के समय उतेरा फसल को बोना (छिड़काव) चाहिये। ऐसे क्षेत्र जहाँ सिंचाई सुविधा धान की फसल के लिये उपलब्ध हो, उतेरा की फसल जमीन में दरार लाकर  लेना लाभदायक पाया गया है। इसके लिये धान के पोटराने  पर खेत से पानी निकाल देना चाहिए। जमीन में 2 से 5 से.मी. (1 से 2 इंच) गहरी दरार  आने पर खेत में पुनः पानी  भर दिया जाए। यह स्थिति खेत से पानी निकालने के 6 से 8 दिनों के अन्दर आ जाती है। खेत में 5 से 7 दिनों तक पानी भरे रखने के बाद उतेरा की फसल प्रचलित पद्धति द्वारा ली जाती है। इस विधि से उतेरा की सामान्य पद्धति की अपेक्षा 50 प्रतिशत से अधिक पैदावार प्राप्त होने के अलावा धान की पैदावार पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता तथा उतेरा फसल में खरपतवार समस्या भी काफी कम हो जाती है। बीज छिड़कते समय यह सावधानी आवश्यक है कि बीज खेत में समान रूप से फैल जाए। अलसी में 1 - 2 बार हाथ से निराई-गुड़ाई करने से खरपतवार नियंत्रित रहते हैं और उपज अधिक मिलती है। अधिक उपज के लिए आवश्यकतानुसार पौध संरक्षण उपाय भी अपनाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

          पौधों की अच्छी बढ़वार और उपज के लिए भूमि में पोषक तत्वों की उचित मात्रा प्रदाय करना आवश्यक है। जीवन चक्र में अलसी का पौधा केवल 45 दिनो  तक ही पोषक तत्व ग्रहण करता है, जो  शेष जीवन के लिए भी पर्याप्त माना जाता है । सामान्य पद्धति से असिंचित भूमि में अलसी की खेती के लिए 30 किलो नत्रजन और   15 किलो स्फुर प्रति हेक्टेयर बुआई के समय देना चाहिए। सिंचित भूमि के लिए 60 किलो नत्रजन, 30 किलो स्फुर प्रति हेक्टेयर देना लाभप्रद रहता है। खाद बीज के पास दो नली वाले नारी हल द्वारा बोने के समय देना चाहिये। सिंचित दशा में नत्रजन की 2/3 तथा फास्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा बोने के समय तथा शेष नत्रजन की 1/3 मात्रा पहली सिंचाई के समय देना चाहिये। नाइट्रोजन धारी उर्वरकों के प्रयोग से पौधों मे फूल और संपुट अधिक संख्या में बनते हैं, जिसके फलस्वरूप उपज में वृद्धि होती है। फास्फोरस प्रदान करने के लिए सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग अधिक उपयोगी रहता है क्योंकि इससे फसल को फास्फोरस के अतिरिक्त सल्फर तत्व भी प्राप्त हो जाता है, जो  कि बीज में तेल की मात्रा बढ़ाने में सहायक रहता है।
    उतेरा पद्धति में 10 - 20 किलो नत्रजन प्रति हेक्टेयर धान के फूलने के समय अथवा उतेरा बोते समय डालना चाहिये। यह धान के लिये इस समय डालने वाली नत्रजन की मात्रा के अतिरिक्त होगा।

सिंचाई

          अलसी की खेती मुख्यतः वर्षा निर्भर क्षेत्रों में की जाती है। भारी मटियार मिट्टी वाले क्षेत्रो  में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु दोमट या हल्की मिट्टी पर जाड़े की वर्षा   न ह¨ने पर 1-2 सिंचाई करनी पड़ती है । सामान्य पद्धति से बोई जाने वाली अलसी में सिंचाई देने पर पैदावार डेढ़ से दो गुना अधिक ली जा सकती है। फसल बोते समय आवश्यक होने पर सिंचाई देना चाहिये। पहली सिंचाई फसल बोने के 30 - 40 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई फसल में फूल आने के पहले करना चाहिए। सिंचाई दाना बनते  समय  बंद कर देना चाहिये। अच्छी उपज के लिए फसल में 2 से 3 सिंचाई पर्याप्त हैं। खेत में जल निकास आवश्यक है।

खरपतवार नियंत्रण

    अलसी की फसल बोने से 35 दिन तक खरपतवार रहित  रखनी चाहिए। इस समय खरपतवार नियंत्र्ाण के उपाय न करने से 25-40 प्रतिशत उपज में हांनि संभावित है । अलसी की सिंचित ख्¨ती करने पर कम से कम एक निंदाई गुड़ाई करना आवश्यक है। फसल धनी   होने पर पहली निकाई  के समय पँक्तियों में पौधों की छँटाई करके पौधों के बीच की दूरी 5-6 सेमी. कर लेते है। यह कार्य शीघ्र ही कर ल्¨ना चाहिए । अलसी में रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालिन 30 ईसी 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर बुआई के तुरन्त बाद 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिये। फसल में शाखाएं बनने पर या जब प©ध्¨ 8-15 सेमी. ऊँचाई के हो , उस समय नीदानाशक एमसीपीबी 0.5 किग्रा. प्रति हैक्टर की दर से छिड़कने से चोड़ी पत्ती वाले खरपतवारो  पर नियंत्रण पाया जा सकता है ।छत्तीसगढ़ तथा कुछ अन्य राज्यों में अमरबेल  नामक पौध परजीवी का प्रकोप अलसी की फसल में पाया जाता है। इसकी रोकथाम के लिए इसकी परजीवी लताओं  को खेत से तथा अमरबेल के बीजों को अलसी के बीजों से छाँटकर अलग कर बुआई करना चाहिए। खड़ी फसल  (2-3 सप्ताह की अवस्था में ) में प्रोनोमाइड 1.5 किग्रा. प्रति हैक्टर का छिड़काव करने से अमरबेल पर नियंत्रण पाया जा सकता है । इसके अलावा फसल-चक्र अपनाने से इस परजीवी के  प्रसार को  रोका जा सकता है ।
फसल चक्र
           खरीफ फसलें जैसे- धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन आदि के बाद रबी में अलसी की फसल ली जाती है। अलसी की मिलवा खेती भी प्रचलित है। अलसी को चने या मसूर के साथ (2-3: 1 कतार अनुपात), गेहूँ के साथ (3:1 या 4:1) या कुसुम के साथ भी अन्तः फसली के रूप मे बोया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में अलसी को प्रमुखतया उतेरा फसल के रूप में लिया जाता है। धान की खड़ी फसल में अलसी की मिलवां खेती चना, खेसारी, मसूर, मटर आदि के साथ सफलतापूर्वक की जा सकती है। शरदकालीन गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य अलसी की दो कतारें भी उगाई जा सकती हैं।

कटाई एवं गहाई

              सामान्यतौर  पर अलसी की फसल 130-150 दिन में तैयार हो  जाती है ।  फूल लगने के 5-8 दिन बाद गूलर दिखलाई पड़ते है जो  फरवरी के अन्त से लेकर मार्च के मध्य तक पकते है । आमतौर  पर अलसी की फसल मार्च के अंतिम सप्ताह से लेकर अप्रैल के द्वितीय सप्ताह तक तैयार हो जाती है। फसल पकने पर तने पीले पड़ जाते हैं, संपुट सूखने लगते हैं और पत्तियाँ सूख कर झड़ने लगती है। संपुट  के पकते ही फसल काट लेना चाहिए, क्योकि ये फट जाते है जिससे दानो  के बिखर जाने से उपज की हांनि होती है । फसल की कटाई हँसिया से भूमि की सतह पर से की जाती है अथवा पौधों को हाथ से उखाड़ लिया जाता है। काटने के बाद फसल को खलिहान में सुखाकर डंडों से पीटकर बीज अलग (मड़ाई) कर लेते हैं। हवा के द्वारा भूसा अलग कर बीज को साफ कर लेते हैं।

उपज एवं भंडारण

            अलसी की उपज बोई गई किस्म, बोआई के समय और  फसल प्रबन्ध पर निर्भर करती है जो  कि विभिन्न क्षेत्रो  में अलग -अलग आती है । सामान्यतौर  पर अलसी की उन्नत किस्मों से 10 से 18 क्विंटल  तथा मिश्रित फसल से 4 - 5क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। भूसी  जानवरो  के खिलाने के काम नहीं आती । अलसी के हरे पौधो को  पशुओ को  खिलाने से भी हांनि होती है और  वे मर भी सकते है । अलसी के बीज से लगभग 33 प्रतिशत तेल और  67 प्रतिशत खली प्राप्त होती है । छोटे दाने वाली अलसी से 33% तथा बड़े दाने वाली अलसी से  34-36% तेल प्राप्त होता है। देशी या घरेलू घानी से 25 से 30 प्रतिशत तेल निकलता है। अलसी की खली जानवरो  का बहुत ही प्रिय भोजन है । इसका उपयोग सीमित रूप में खाद के लिए भी होता है ।
              अलसी से रेशा प्राप्त करने के लिए पौधों को बण्डलों के रूप में बाँधकर पानी में दबाया जाता है। तापक्रम की अवस्थाओं के अनुसार पोधे 3 - 5 दिन में सड़ जाते हैं और रेशा अलग करने योग्य हो जाता है। अलसी के रेशे को फ्लैक्स कहते हैं। बीज को अच्छी प्रकार से धूप में सुखाकर जब उनमें 10 से 12 प्रतिशत तक नमी रह जाय तो बोरियों में भरकर सूखे भंडार गृह में रखना चाहिए। बीज में नमी का अंश अधिक होने पर उनकी अंकुरण क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके बीजों को 5 डिग्री से. तापक्रम पर अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

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