शनिवार, 14 दिसंबर 2013

सस्टेनबल सुगरकेन इनिसिएटिव(एस.एस.आई.): गन्ना उत्पादन की नवोन्वेषी तकनीक


डाँ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्राध्यापक (सस्य विज्ञान विभाग)
इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

न्यूनतम लागत और अधिकतम लाभ :गन्ना उत्पादन की नवोन्वेषी तकनीक


                   ईख अर्थात गन्ना विश्व की सबसे महत्वपूर्ण औऱ  औधोयोगिक-नकदी  फसल है । भारत को  गन्ने का जन्म स्थान माना जाता है, जहां विश्व में गन्ने के  अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्रफल पाया जाता है । विश्व में सर्वाधिक चीनी मिलें (660)  भारत में स्थापित है जिनसे 30 मिलियन टन चीनी उत्पादित (विश्व में दूसरा स्थान) होती है । देश में निर्मित सभी मीठाकारको  (चीनी,गुड़ व खाण्डसारी) के  लिए गन्ना ही मुख्य कच्चा माल है । गन्ना खेती की बढती लागत और  प्रति इकाई कम उत्पादन के  कारण किसानों  को बहुत सी समस्याओं  का सामना करना पड़ रहा है । भारत में गन्ने की  औसत उपज 70-85 टन प्रति हैक्टर के  इर्द-गिर्द ही आ पाती है जबकि ब्राजील  और थाइलेंड में 120 टन प्रति हैक्टर की अ©सत उपज ली जा रही है । मध्यप्रदेश और  छत्तीसगढ़ के  किसान  तो  गन्ने से औसतन 30-35 टन प्रति हैक्टर के  आस-पास उपज ले पा रहे है । गन्ने की खेती में लगने वाली आगतो (खाद,बीज,पानी और श्रम) की बढ़ती कीमते और  कम उपज ही गन्ना कृषको  की प्रमुख समस्या है। 
                   गन्ना फसल की भारी जल मांग, गिरते भूजल स्तर तथा रासायनिको के  बढ़ते उपयोग को  देखते हुए पारस्थितिक समस्यायें भी बढ़ रही है । अब समय आ गया है कि हमें प्रकृति मित्रवत खेती में कम लागत के  उन्नत तौर तरीके  अपनाने की आवश्यकता है जिससे प्राकृतिक संसाधनो का कुशल प्रबन्धन करते हुए गन्ना फसल से अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके । इस परिपेक्ष्य में धान का उत्पादन बढाने में हाल ही में अपनाई गई "श्री विधि" कारगर साबित हो  रही है। इसी तारतम्य में हैदराबाद स्थित इक्रीसेट व डब्लू.डब्लू.एफ. प्रोजेक्ट ने गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक का विकास किया है, जिसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हो रहे है।   एस.एस.आई.अर्थात सस्टेनेबल सुगरकेन इनीशियेटिव (दीर्धकालीन गन्ना उत्पादन तकनीक) गन्ना उत्पादन की वह विधि है जिसमें गन्ने से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने न्यूनतम बीज और  कम पानी में भूमि व उर्वरकों  का कुशल उपयोग किया जाता है । वास्तव में यह बीज, जल और  भूमि का गहन उपयोग करने वाली गन्ना उत्पादन की नवीन वैकल्पिक विधि है । दरअसल, पर्यावरण को  क्षति पहुँचाये बिना प्रति इकाई जल, जमीन और  श्रम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की यह नवीन अवधारणा है, जिसके  प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैः
1.    गन्ने की एकल कलिका वाले टुकडो का प्रयोग करते हुए पौधशाला स्थापित करना
2.    कम आयु (25-35 दिन) की पौध रोपण
3.    मुख्य खेत में पौधों  के   मध्य उचित फासला( 5 x 2 फीट) रखना
4.    मृदा में आवश्यक नमीं कायम रखना तथा खेत में जलभराव रोकना
5.    जैविक माध्यम से पोषक तत्व प्रबंधन व कीट-रोग प्रबंधन
6.    भूमि और  अन्य संसाधनो  का  प्रभावकारी उपयोग हेतु अन्तर्वर्ती फसलें लगाना ।
गन्ना की अधिक उपज देने वाली  को-86032 किस्म
                    गन्ना लगाने की पारंपरिक विधि में रोपाई हेतु 2-3 आँख वाले टुकडॉ का उपयोग किया जाता है। एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ गन्ने से सावधानी पूर्वक एक-एक कलिकाएं निकालकर पौधशाला (कोको पिथ से भरी ट्रे) में लगाया जाता है । मुख्य खेत में 25-35 दिन की पौध रोपी जाती है । पौधशाला में एक माह में पौधों  की वृद्धि बहुत अच्छी हो  जाती है। पारंपरिक विधि में एक एकड़ से 44000  गन्ना प्राप्त करने हेतु दो  कतारों के  मध्य 45 से 75 सेमी.(1.5-2.5 फीट) की दूरी रखी जाती है और  प्रति एकड़ तीन आँख वाले 16000 टुकड़े (48000 आँखे) सीधे खेत में  रोप दी जाती है । परन्तु अंत में सिर्फ 25000 पिराई योग्य गन्ना ही प्राप्त हो  पाता है । जबकि एस.एस.आई. विधि में अधिक फासलें (कतारों  के  मध्य 5 फीट और  पौधों  के  मध्य 2 फीट) में रो पाई करने से कंसे अधिक बनते है जिससे 45000 से 55000 पिराई योग्य गन्ना प्राप्त हो  सकता है । इस प्रकार से कतारों  व पौधों  के  मध्य चौड़ा फासला रखने से न केवल कम बीज ( तीन आँख वाले 16000 टुकड़¨ं की अपेक्षा एक आँख वाले 5000 टुकड़े) लगता है बल्कि इससे प्रत्येक पौधे को हवा व प्रकाश सुगमता से उपलब्ध होता रहता है जिससे उनका समुचित विकास ह¨ता है ।
               एस.एस.आई. विधि में जल प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया जाता है । खेत में पर्याप्त नमीं बनाये रखना लाभकारी पाया गया है । बाढ. विधि से सिंचाई करने से पानी कि अधिक मात्रा तो लगती ही है, पौधों  की बढ़वार पर भी बिपरीत प्रभाव पड़ता है । पौधशाला में पौध तैयार करना, कूड़ या एकान्तर कूड़ विधि या टपक विधि से आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से 40 प्रतिशत तक जल की वचत संभावित है । दीर्धकाल तक अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु रासायनिक उर्वरको  और  कीटनाशको  पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है । इसके  लिए जैविक खाद व जैव उर्वरकों  का प्रयोग किया जाना आवश्यक है । समन्वित     पोषक तत्व प्रबंधन करना अधिक लाभकारी पाया गया है  । एस.एस.आई. विधि में गन्ने की दो  कतारों के  बीच गेंहू, चना, आलू, राजमा, बरवटी, तरबूज, बैगन आदि फसलों की अन्र्तवर्ती खेती को  प्रोत्साहित किया जाता है । इससे भूमि, जल आदि संसाधनों का कुशल उपयोग होने के साथ-साथ खरपतवार भी  नियंत्रित रहते है और  किसानो  को  अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त हो  जाती है ।

                                                   एस.एस.आई. तकनीक  के प्रमुख चरण

1.आँख (कलिका चयन)
                        एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ मातृ गन्ने से एकल आँख वाले टुकङों को  पौधशाला में लगाया जाता है । इस विधि में गन्ने की कतारों एवं पौधों के मध्य काफी दूरी (कतारों  के  मध्य 5 फीट और  पौधों के मध्य 2 फीट) रखी जाती है जिससे प्रति एकड़ 5000 कलिकाओ  की आवश्यकता होती है । कलिका चयन हेतु स्वस्थ 7-9 माह पुराने एसे गन्नो को छांटे जिनके  इंटरनोड की लंबाई (17-20 सेमी.) और  मोटाई अच्छी हो  । कलिका चयन के  समय ध्यान में रखें की कलिकाएं न तो  अधिक ऊपर से और  न ही नीचे की 3-4 छोटी इंटरनो ड से लें । कीट-रोग संक्रमित गन्नो  का प्रयोग बीज हेतु न करें । बीज के  लिए चयनित गन्ने से कलिका निकालने हेतु बड चिपर (औजार) का प्रयोग करना चाहिए । इससे कम समय में अधिक आँखे (150 प्रति घण्टा) सुगमता से निकल आती है । इससे आँखे क्षतिग्रस्त भी नहीं ह¨ती है । अस्वस्थ, क्षतिग्रस्त अथवा अंकुरित कलियों को निकाल कर अलग कर दें । जितनी आवश्यक हो, उतनी ही कलिका तैयार करें । खेत से लाये गये बीजू गन्नो को  छाया में रखना चाहिए । एक एकड़ के  लिए 7-9 माह के  450 से 500 गन्नो  (प्रत्येक में 10-12 कलिका हो ) की आवश्यकता होती है । एक एकड़ हेतु पौधशाला बनाने 100 प्लास्टिक ट्रे (प्रत्येक में 50 कोन होते है) में 150 किग्रा. कोको पिथ (नारियल का जूट) डालकर 5000 कलिकाओ को लगाया जाना चाहिए ।

2. बीज (कलिका) शोधन

                   कीट-रोग संक्रमण से कलिकाओ  की सुरक्षा करने के  लिए उनका उपचार करना आवश्यक होता है ।कलिका उपचार हेतु सबसे पहले एल्युमिनियम या प्लास्टिक के पात्र में 10 लीटर पानी भर कर जैविक व रासायनिक दवाएं (मैलाथियान 20 मिली, कार्बेन्डाजिम 5 ग्राम, ट्राइकोडर्मा-500 ग्राम, गौमूत्र-1 से 2 लीटर और  बुझा चूना-100 ग्राम) घोल लेते है । बीजू टुकडो को जूट के  बोरे में रखकर उक्त घोल में 10-15 मिनट डुबा एं । इसके  पश्चात इन टुकडो को  निकालकर 2-3 घण्टे छाया में सुखाने के  बाद पौधशाला में लगाना चाहिए । इस प्रकार से कलिका शोधन करने से 90 प्रतिशत तक अंकुरण होता है ।

3.पौधशाला तैयार करना

                  गन्ने की पौध तैयार करने के  लिए छाया-जाली (शेड नेट) का उपयोग करना उत्तम रहता है । अच्छी प्रकार से सड़ा हुआ कोकोपिथ (नारियल की जटा) लेकर प्रत्येक प्लास्टिक ट्रे के  कोन को  आधा भर दें । अब कोन में एक टुकड़े को  समतल या हल्का तिरछा रखकर कोको पिथ से हल्का ढंक दें । ध्यान रखें कि आँख की स्थिति ऊपर की तरफ रहें । सभी ट्रे भरकर इसी प्रकार से टुकडो को लगाना चाहिए । अब ट्रे को  एक दूसरे के  ऊपर जमाकर रखें (चार सेट-प्रत्येक में 25 ट्रे) तथा सबसे ऊपर एक खाली ट्रे को  उलटा कर रखें तथा पोलीथिन से प्रत्येक सेट को  बांध कर 5-8 दिन के  लिए यथावत स्थिति में छोड़ दें । दीमक से बचाव हेतु ट्रे के  चारो  तरफ भूमि में क्लोरोपायरीफास 50 ईसी (5 मिली प्रति लीटर पानी) छिड़कना चाहिए । ध्यान रखें कि ट्रे को पो लीथिन में लपेटकर छाया-जाली या कमरे के  अन्दर रखें जिससे उसमें हवा, पानी व प्रकाश प्रवेश न कर पाये । मौसम ठण्डा होने पर कमरे में कृत्रिम ताप (बल्व) की व्यवस्था करना चाहिए । उपयुक्त दशा (गर्म जलवायु) में 3-4 दिन के  अन्दर पौध में सफेद जड़ें तथा 2-3 दिन बाद तना दिखने लगता है।
            जलवायुविक परिस्थितियों के  अनुसार 5-8 दिन में सभी अंकुरित ट्रे को  पालीथिन से अलग करें और  जमीन पर विधिवत जमाकर रखें जिससे उनमें पानी व अन्य प्रबंधन कार्य आसानी से किये जा सके  । ट्रे की कोको पिथ में नमीं की स्थिति देखकर पौधों में फब्बारे की सहायता से संध्या के  समय 15 दिन तक हल्का पानी देते रहना चाहिए । तने की बढ़वार होने लगती है तथा पत्तियाँ निकलने लगती है । दो  पत्ती अवस्था पर पानी की मात्रा बढ़ा देना चाहिए ।
        पौध की छठी पत्ती अवस्था (लगभग 20 दिन की पौध) पर एकसार लंबाई के  पौधों  को छांटकर अलग-अलग ट्रे में रखें । पौध छांटने के  एक दिन पूर्व पानी देना बंद कर दें जिससे ट्रे की कोको पिथ ढीली हो  जाए । क्षतिग्रस्त या मृत पौध अलग कर दें ।

4.मुख्य खेत की तैयारी

                      खेत से पिछली फसल के अवशेष व खरपतवारों  की सफाई कर एक-दो  बार जुताई कर एक सप्ताह के  लिए खुला छोड़ देना चाहिए । खेत में 25-30 सेमी. गहरी जुताई करने से हवा पानी का आवागमन अच्छा होता है । भूपरिष्करण का कार्य हैरो  या रोटावेटर की सहायता से इस प्रकार करे जिससे खेत में फसल अवशेष व ढेले न रहें । हल्का सा ढाल रखते हुए  पाटा चला कर खेत को समतल बनाए जिससे सिंचाई व जलनिकास सुगमता से हो  सके  ।

5.जैविक खाद का प्रयोग

                  गन्ना उत्पादन की इस विधि में जैविक खाद के  प्रयोग को  बढ़ावा दिया जाता है । जैविक अर्थात कार्बनिक खादों के  प्रयोग से भूमि में पोषक तत्वों  की उपलब्धता बढने के  साथ साथ, पर्यावरण संरक्षण और  रासायनिक उर्वरको  की  उपयोग क्षमता भी बढ़ती है । अंतिम जुताई के  समय प्रति एकड़ 8-10 टन गोबर की खाद या कंपोस्ट या शक्कर कारखाने से प्राप्त प्रेसमड मिट्टी में मिलाना चाहिए । जैविक खाद की मात्रा इस प्रकार से समायोजित करें जिससे फसल को  112 किग्रा. नत्रजन प्रति एकड़ प्राप्त हो  जाए । जैविक खाद में ट्राइकोडर्मा और  स्यूडोमोनास (प्रत्येक 1 किग्रा प्रति एकड़ की दर से) मिलाने से मृदा उर्वरता में सुधार होता है जिससे उपज में बढोत्तरी होती है। हरी खाद वाली फसलें जैसे सनहेम्प या ढ़ेंचा उगाकर भी अंतिम जुताई के  समय खेत में मिलाना लाभप्रद रहता है । खेत में नालियाँ (5 फिट के  अन्तर पर) बनाने से खाद एवं सिंचाई का उपयोग कुशलता से किया जा सकता है ।

6.पौ ध रोपड़

                       पौधशाला में तैयार पौधों को  25 से 35 दिन की अवस्था पर मुख्य खेत में  रोपण कर देना चाहिए । रोपण से एक दिन पहले पौधशाला में सिंचाई बंद कर दे जिससे कोन की कोकोपिथ ढीली हो  जाए तथा कोन से पौध आसानी से निकल सके । पौध रोपण से 1-2 दिन पूर्व खेत में सिंचाई करें । खेत में पौध को  2 फिट की दूरी पर जिगजैग (जेड आकार) विधि से लगाने से पौधों को स्थान व प्रकाश अधिक मिलनेे से कंसे अधिक फूटते है । अच्छा होगा यदि पौधों  का रोपण उत्तर-दक्षिण दिशा में किया जाये । पौध रोपण  के  पश्चात खेत में हल्की सिंचाई करें । पौध स्थापित हो जाने के  उपरांत मातृ तने को  भूमि से 1 इंच ऊपर से काट देने से कंसे एक समान और  अधिक मात्रा में बनते है जिससे पिराई योग्य गन्ने अधिक संख्या में प्राप्त होते है । इस कार्य को  थोड़े से क्षेत्र में प्रयोग करके  परखें तथा अच्छे परिणाम दिखने पर बड़े पैमाने पर प्रयोग करें । जलवायु की स्थिति तथा पौध बढ़वार के  अनुसार मातृ तनों को रोपाई के  3 से 30 दिन के  अन्दर काटा जा सकता है । फंफूद संक्रमण से पौध सुरक्षित रखने के  लिए मातृ तना काटने से पूर्व सिंचाई अवश्य करें ।

7.निंदाई-गुड़ाई

                 नमीं और पोषक तत्वों के प्रभावकारी अवशोषण हेतु खेत को  खरपतवार मुक्त रखना अनिवार्य हो ता है । इसके  लिए रोपण से पहले खेत की गहरी जुताई कर बहुवर्षीय खरपतवारो को निकाल देना चाहिए । रोपाई के  30, 60 व 90 दिन बाद यांत्रिक विधियों  (कोनोवीडर) से निदाई गुड़ाई संपन्न करें । खरपतवार नियंत्रण की अन्य वैकल्पिक विधि का  प्रयोग आवश्यकतानुसार करते रहें ।

8.पलवार का प्रयोग

            गन्ने की सूखी पत्तियों  या कचरा का उपयोग पलवार के  रूप में करने से खेत के खरपतवार कम उगते है, नमीं का सरंक्षण होता है और खेत में केचुआ भी अधिक पनपते है जिससे मृदा उर्वरता, जल धारण क्षमता व वातन में सुधार होता है । अतः गन्ने की कतारों  में 1.5 टन प्रति एकड़ की दर से रोपाई के 3 दिन के  अन्दर गन्ना अवशेष विछाना लाभकारी होता है ।

9.उर्वरक प्रयोग

                     दीर्धकालीन फसल होने के कारण गन्ने को अधिक मात्रा में पोषक तत्वों कि आवश्यकता होती है।  अतः फसल बढ़वार व विकास हेतु पोषक तत्व प्रबंधन  पर ध्यान देना आवश्यक होता है । पोषक तत्वो  की सही मात्रा का निर्धारण मृदा परीक्षण के  आधार पर किया जाना चाहिए । मृदा परीक्षण संभव न होने पर नत्रजन, स्फुर व पोटाष की क्रमशः 112, 25 व 48 किग्रा. मात्रा प्रति एकड़ की दर से दी जा सकती है । उक्त पोषक तत्वो  की पूर्ति यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट, म्यूरेट आफ पोटाष और  अमोनियम सल्फे ट के  माध्यम से की जा सकती है । उक्त उर्वरकोण को  2-3 किस्तों  में देना लाभप्रद रहता है । खेत की अंतिम तैयारी करते समय जैविक खादों  यथा गोबर की खाद (3-4 टन), मुर्गी खाद(1-2 टन) या प्रेसमड को मिटटी में अच्छी प्रकार मिलाना चाहिए । इसके  अलावा जैव उर्वरको  जैसे एजोस्परिलम एवं फास्फ़ो बैक्टीरिया (प्रत्येक 2 किग्रा.) को  200 किग्रा. गोबर की खाद के  साथ मिलाकर रोपाई के  30 व 60 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय कतार में देने से पौधों  का विकास अच्छा होता है ।

10.जल प्रबंध

                गन्ने की फसल में बाढ़ विधि से अधिक पानी देने की अपेक्षा समय पर ईष्टतम मात्रा में पानी देना उपयुक्त रहता है । औसतन  100 टन पिराई  योग्य  गन्ना पैदा करने के  लिए वर्षा जल को  मिलाकर लगभग 1500 मिमी. जल (फसल अवधि के दौरान 60 लाख लीटर पानी प्रति एकड़) की आवश्यकता होती है । जबकि परंपरागत विधि के  अन्तर्गत बाढ़ विधि से 2000 मिमी. जल (80 लाख लीटर प्रति एकड़) सिचाई के  माध्यम से देना पड़ता है । बाढ विधि से सिंचाई करने पर पानी बर्वाद होने के  साथ-साथ फसल वृद्धि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।
                  गन्ने में सिंचाई की संख्या भूमि का प्रकार, जलवायु, वर्षा की मात्रा और  फसल की आयु पर निर्भर करती है । हल्की मृदा में अधिक तथा भारी मृदाओं  में कम सिंचाई देना पड़ती है । कल्ले बनने की अवस्था (36-100 दिन) के  समय 10 दिन के  अन्तराल, फसल की अधिकतम बढ़वार (101-270 दिन) के  समय 7 दिन तथा परिपक्वता अवधि (271 से कटाई तक) 15 दिन के  अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए । सिंचाई नाली अथवा कतार छोड़ विधि से करने से 50 प्रतिशत जल की वचत होती है । बूंद-बूंद (टपक) सिंचाई विधि से 90 प्रतिशत सिंचाई दक्षता मिलती है एवं 40-50 प्रतिशत जल की वचत होती है । एस.एस.आई. विधि से गन्ना लगाने से लगभग 4-5 सिंचाईयों  की बचत होती है क्योकि गन्ने की अंकुरण अवस्था (35 दिन तक) पौधशाला में व्यतीत हो  जाती है । सीधे खेत में गन्ना  रोपने से प्रारम्भिक एक माह तक अधिक सिचाई करना होता है।

11.मृदा दाब (मिट्टी चढ़ाना)

                    गन्ने के पौधों पर मिटटी चढ़ाना एक महत्वपूर्ण ही नहीं वल्कि आवश्यक सश्य क्रिया है, जिसमें  पौधों को  दृढ़ता प्रदान करने उसके  जड़ क्षेत्र पर मिट्टी चढ़ाई जाती है । फसल अवधि के दौरान दो  बार मिट्टी चढ़ाने (आंशिक व पूर्ण रूप से) का कार्य किया जाता है । पहली बार खड़ी फसल में उर्वरक देते समय आंशिक मिट्टी चढ़ाने (नाली के दोनों तरफ से मिट्टी लेकर) का कार्य किया जाता है जिससे नवोदित जडॉ  को  सहारा मिलने के  अलावा मृदा में उर्वरक भली भांति मिल जाता है । यह कार्य देशी हल की सहायता से भी किया जा सकता है । दूसरी बार खड़ी फसल में उर्वरक देने के  बाद (चरम कंशा निर्माण अवस्था) पूर्णरूप से मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जाता है । इसमें मेड़ की मिट्टी को  दोनों तरफ नालियों में डाला जाता है जिससे नालियों  की जगह मेंड़ और  मेंड़ के  स्थान पर नालियाँ बन जाती है । इस प्रकार से नवनिर्मित नालियाँ सिंचाई हेतु उपयोग में ली जाती है ।

12.डिट्रेसिंग

                 पौधों  से गैर उपयोगी और  अधिक पत्तियों को निकालने की क्रिया डिट्रेसिंग कहते है । गन्ने के  पौधों  में बहुत सी पत्तियाँ विकसित होती है । फसल बढ़वार की उत्तम परिस्थितियों  में सामान्य तने में 30-35 पत्तियाँ बनती है । परन्तु कारगर या प्रभावकारी प्रकाशसंश्लेषण हेतु ऊपर की 8-10 पत्तियाँ पर्याप्त होती है । पौधे की अधिकांश नीचे वाली पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण क्रिया में भाग नहीं लेती है और  अंततः सूख जाती है । परन्तु वे भूमि से पोषक  तत्व ग्रहण करने में प्रतिस्पर्धा करती है । अतः यह आवश्यक है कि पांचवे व सातवे माह में नीचे की  सूखी व हरी पत्तियों को निकाल कर दो  कतारों के  मध्य पलवार के  रूप में विछा देना चाहिए । डिट्रेसिंग करने से पौधो के बीच हवा व प्रकाश का समुचित आवागमन होता है । खेत में सफाई रहने से कीट-रोग का संक्रमण कम होता है । खेत में निंदाई-गुड़ाई जैसे सस्य कार्य सुगमता से संपन्न किये जा सकते है ।इस प्रकार गैर- ऊपयोगी व सूखी पत्तियों को  तनों से निकल कर  पलवार के  रूप में प्रयोग करने से न केवल पौधों में प्रकाश संश्लेषण और पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ता है वाकई मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में बढोत्तरी भी होती है ।

13.सहारा देना

               गन्नों  को  गिरने से बचाने के  लिए  उनके  तनों को  मिलाकर पत्तियों  की सहायता से बांध दिया जाता है जिसे सहारा देना कहते है । परंपरागत विधि में या तो  गन्नो  को  प्रत्येक कतार में बांधा जाता है अथवा दो  कतारॉ  के  गन्नो को  आपस में बांध दिया जाता है । एसएसआई विधि में खेत में  एक तरफ लकड़ी के  खंबे गाड़ दिये जाते है, जिनके  सहारे पौधों को  बांधा  जाता है । मुख्यरूप से मध्यम स्तर की सूखी या गैर उपयोगी पत्तियों को  मिलाकर तनों  को  आपस में बांध  दिया जाता है, जिससे उनके गिरने कि सम्भावना नही रहती है।

14.पौध संरक्षण

                 मीठा होने कि वजह से गन्ने की फसल में विभिन्न कीट-रोगों  का प्रकोप अधिक  होता  है । जैविक विधि से कीट व रोगों पर नियंत्रण पाया जाता है ।  कीट-रोग प्रतिरोधी किस्मों के  बीज का चयन करें तथा बीजोपचार कर बुवाई करें । फसल चक्र व सस्य विधियों  का अनुपालन करने से कीट-ब्याधियों  का प्रकोप कम होता  है ।

15.अंतरवर्ती खेती

                  गन्ने के  पौधें  काफी दूरी पर लगाये जाते है । अतः गन्ने की दो  कतारों  के  मध्य लोबिया, चना, आलू, मूंग, गेंहू, सरसॉ , ककड़ी, तरबूज आदि फसलें लगाई जा सकती है । अंतरवर्ती फसल से खरपतवार नियंत्रित रहते है, मृदा उर्वरता में सुधार होता है तथा अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है ।

16.गन्ना कटाई

            गन्ने की कटाई सही समय पर आवश्यकतानुसार करें । एक वर्ष की फसल के पौधों में वांछित शुक्रोश  प्रतिशत 10वें माह में आने लगता है । इसके  दो  माह में गन्ना कटाई कार्य किया जा सकता है ।

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