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सोमवार, 3 अगस्त 2020

रासायनिक उर्वरकों के साथ जैव उर्वरक का प्रयोग लाभप्रद

                                                 डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर

प्रोफ़ेसर (सस्यविज्ञान)

इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय,कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,

कोडार रिसोर्ट, कांपा, महासमुंद (छत्तीसगढ़)

  

भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढती हुई जनसँख्या को देखते हुए एवं आमदनी की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। हर्ष की बात है की 2.1 प्रतिशत की दर से प्रतिवर्ष बढ़ने वाली आबादी के साथ कृषि उत्पादन का संतुलन बना हुआ है। कृषि उत्पादन वृद्धि में उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों, सिंचाई जल एवं पौध संरक्षण का उल्लेखनीय योगदान रहा है। रासायनिक उर्वरकों की बढती कीमतों  के कारण  खेती की लागत बढती जा रही है। फसलों के लिए जरुरी पोषक तत्वों में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश में से नत्रजन का सर्वाधिक उपयोग होता है। भूमि में डाले गये नत्रजन का  अधिकतम 30-40 प्रतिशत ही फसल उपयोग कर पाती हैं और शेष 60-70  प्रतिशत भाग या तो नष्ट हो जाता है या जमीन में ही अस्थायी बन्धक हो जाता हैं। अन्य पोषक तत्वों में फॉस्फोरस धारी उर्वरक तो पौधों को 15-20 प्रतिशत ही उपलब्ध हो पाते है, शेष भूमि में स्थिर हो जाता है । भारत जैसे विकासशील देश में नत्रजन एवं फॉस्फोरस की आपूर्ति केवल रासायनिक उर्वरकों से कर पाना छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों की क्षमता से परे है । वर्तमान परिस्थितियों में नत्रजन एवं फॉस्फोरस धारी उर्वरकों के साथ-साथ इनके वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने तथा मृदा की उर्वरा शक्ति को टिकाऊ  बनाये रखने के लिए भी आवश्यक है। ऐसी स्थिति में जैव उर्वरकों एवं रासायनिक उर्वरकों के एकीकृत उपयोग की करने की  आवश्यकता है।

विभिन्न जैव उर्वरक फोटो साभार गूगल

जैव उर्वरक जीवाणु खाद क्या है?

पौधों या फसलों की अच्छी वृद्धि के लिए मुख्यतः 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जिनमें नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश अति आवश्यक पोषक तत्व है। यह पौधों को तीन प्रकार यथा रासायनिक खाद, गोबर की खाद/ कम्पोस्ट तथा नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणुओं द्वारा उपलब्ध होते  है। प्राकृतिक रूप से भूमि में कुछ ऐसे जीवाणु विद्यमान होते है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को अमोनियम नाइट्रेट में एवं स्थिर फॉस्फोरस को घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर देते है। जैव उर्वरक इन्हीं सूक्ष्म जीवों का उत्पाद है जो पौधों को नत्रजन एवं फास्फोरस आदि की उपलब्धता बढ़ाता है। जैव उर्वरक पौधों के लिए वृद्धि कारक पदार्थ भी देते हैं तथा पर्यावरण को स्वच्छ रखने में सहायक हैं। भूमि, जल एवं वायु को प्रदूषित किये बिना कृषि उत्पादन स्तर में स्थायित्व लाते हैं। इन्हें जैव कल्चर या जीवाणु खाद कहते हैं।

नाना प्रकार के जैव उर्वरक

जैव उर्वरक अनेक प्रकार के होते है. नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले दलहनी फसलों के लिए  राइजोबियम कल्चर, गैर-दलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जैव उर्वरकों में एजोटोबेक्टर, एजोस्पाइरिलम कल्चर,नील हरति शैवाल, (वीजीए) व अजोला  तथा फॉस्फेट घुलनशील जैव उर्वरकों में फास्फेटिका कल्चर,माइकोराइजा,ट्राइकोडर्मा आदि आते है जिनका विवरण अग्र प्रस्तुत है

1.राइजोबियम कल्चर

यह एक नमीं युक्त पदार्थ जैसे  चारकोल एवं जीवाणु का मिश्रण है, जिसके प्रत्येक एक ग्राम भाग में 10 करोड़ से अधिक राइजोबियम जीवाणु होते हैं। इस जैव उर्वरक का उपयोग केवल दलहनी फसलों में ही किया जाता है तथा यह फसल विशिष्ट होती है, अर्थात अलग-अलग फसल के लिए अलग-अलग प्रकार का राइजोबियम जैव उर्वरक यानि कल्चर का प्रयोग होता है। राइजोबियम जीवाणु कल्चर  से बीज उपचार करने पर ये जीवाणु बीज पर चिपक जाते हैं। राइजोबियम जीवाणु छोटी-छोटी हलकी गुलाबी रंग की जड़ ग्रंथियों में सहजीवी रूप में वास करते है और वायुमंडल की  नाइट्रोजन को आपसी जैविक क्रियाओं द्वारा अमोनिया में बदल देते है। इन जड़ ग्रंथियों में लैग हीमोग्लोबिन पदार्थ पाया जाता है। अधिक ग्रंथियां होने से फसल की पैदावार अधिक आती है ।

अलग-अलग फसलों के लिए राइजोबियम जीवाणु खाद के अलग-अलग पैकेट उपलब्ध होते हैं राइजोबियम कल्चर 200 ग्राम के पॉकेट में उपलब्ध होता है एक पॉकेट   राइजोबियम कल्चर से से 10 किग्रा बीज उपचारित कर सकते हैं। सबसे पहले एक बर्तन में  400-500  मि.ली. पानी में 50 ग्राम गुड़ मिलाकर तथा उसे उबाल लें। इस घोल के ठंडा होने पर राइजोबियम कल्चर का एक पॉकेट (200 ग्राम) मिलाकर अच्छी प्रकार से घोल बना लेवें  बीजों को साफ सतह पर एकत्रित कर उक्त जीवाणु कल्चर के घोल को बीजों पर धीरे-धीरे डालें, और  हल्के हाथ से तब तक लटते पलटते रहे  जब तक कि सभी बीजों पर जीवाणु कल्चर की समान परत न बन जाये। अब उपचारित बीजों को बिछाकर फैलाकर 10-15 मिनट तक  सुखाने के पश्चात तुरन्त बुवाई करें । राइजोबियम कल्चर के  प्रयोग से उपज में 15 से 40 प्रतिशत तक उपज में इजाफा होता है। इसके बीजोपचार से 10-35  किग्रा रासायनिक नत्रजन की बचत होती है। इसके प्रयोग से वृद्धि वर्धक(साइटोंकानिन) हार्मोन्स भी पोधो को उपलब्ध होते है। इसके प्रयोग से  भूमि की उर्वरा शक्ति बढती है।

2.एजोटोबैक्टर जैव उर्वरक

यह जैविक उर्वरक एज़ोटोबैक्टर कोकोकम से बनी है। यह जीवाणु मिट्टी में पाया जाता है जो नत्रजन परिवर्तन करता है तथा वृद्धि हार्मोन बनाता है । इससे  पौधों की जड़ों का समुचित  विकास होता है। यह कुछ कीटनाशक पदार्थ छोड़ता है जिससे जड़ों की रोगों से सुरक्षा होती है। यह पौधों की बढ़वार एवं उत्पादकता में 15-25 % तक वृद्धि करता है। इसके प्रयोग करने से 20-30 कि.ग्रा. नत्रजन की बचत की जा सकती है। इसके प्रयोग करने से अंकुरण शीघ्र और स्वस्थ होता है तथा जड़ एवं तनों का विकास अधिक एवं शीघ्र होता है। यह जैव उर्वरक गेंहू,धान, कपास,सब्जियों और फलों के लिए उपयोगी रहता है।

3.एजोस्पाइरिलम जैव उर्वरक

यह जीवाणु खाद एजोस्पाइरिलम ब्रैजिलैंस या लिपोफेरम से बनी है. यह जीवाणु जड़ों के समीप पाया जाता है। इसके प्रयोग से 30-35 प्रतिशत  नत्रजन उर्वरक  की बचत की जा सकती है। यह पौधों के जमाव एवं बढ़वार में मदद कर उत्पादकता में 25 % तक की वृद्धि कर सकता है । यह जैव उर्वरक (कल्चर) धान और गन्ना फसल के लिए उपयोगी होता है।

4.एसीटोबैक्टर जैव उर्वरक 

यह खाद एसीटोबैक्टर डाइएजोट्राफिकस नामक जीवाणु से बनी है यह जीवाणु गन्ने के सभी भागों (जड़,तना व पत्ती) में पाया जाता है। इसका प्रयोग गन्ना फसल में किया जाता है यह गन्ने की लम्बाई एवं मोटाई को बढ़ाता है । सामान्यतौर पर इसके उपचार से गन्ना उपज में 5-20 टन प्रति हेक्टेयर और चीनी की मात्रा में 5-15 % की वृद्धि करता है।

4. फॉस्फोरस घुलनशील जैव खाद

यह जैव खाद बैसिलस, स्युडोमोनास एवं या एस्पर्जिलस आवामोरी नामक जीवाणु से बनी है । फास्फेटिक उर्वरकों का लगभग एक तिहाई भाग ही पौधे अपने उपयोग में ला पाते है। शेष अघुलनशील अवस्था में ही पड़ा रह जाता है जिसे पौधे स्वयं घुलनशील नहीं बना पातें। यह जीवाणु पौधों की जड़ों के पास रह कर अघुनशील फास्फोरस को घुलनशील कर पौधों को उपलब्ध करवाते है। इसका प्रयोग सभी फसलों में किया जा सकता है। यह पौधों की वृद्धि को बढ़ाते है तथा उत्पादकता को 15-20 % तक बढ़ा सकते हैं। इसके प्रयोग करने से 25-30 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपलब्ध फास्फेट की बचत की जा सकती है। जड़ों का विकास अधिक होता है, जिससे पौधा स्वस्थ बना रहता है।

5. नील हरित शैवाल

एक कोशिकीय सूक्ष्म नील हरित शैवाल (बी जी ए) नम मिट्टी तथा स्थिर पानी में स्वतन्त्र रूप से पाए जाते हैं। धान के खेत का वातावरण नील-हरित शैवाल के लिए के लिए सर्वथा उपयुक्त होता है। इसकी वृद्धि के लिए आवश्यक ताप, प्रकाश नमी और पोषक तत्वों की मात्रा धान के खेत में विद्यमान रहती है। धान की रोपाई के 3-4 दिन बाद स्थिर पानी में 12.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से सूखे जैव उर्वरक का प्रयोग करें। इसके पश्चात् 4-5 दिन तक लगातार खेत में पानी भरा रहने दें। खेत में लगातार तीन वर्ष तक इसका प्रयोग करने के बाद इसे पुनः डालने की आवश्यकता नहीं होती है। यदि धान में किसी खरपतवारनाशी का प्रयोग कियाजाना है तो इसका प्रयोग खरपतवार नाशी के प्रयोग के 3-4 दिन बाद करें। नील हरित जैव उर्वरक के प्रयोग से 30 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन प्राप्त होती है। इसके प्रयोग से धान के उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है। इसके यह  वृद्धि नियंत्रक एवं विटामिन  भी श्रावित करता हैं जिससे पौधों में अच्छी वृद्धि के साथ-साथ दानों की गुणवत्ता भी बढ़ती है।

6. अजोला

यह  ठण्डे मौसम में स्थिर पानी के ऊपर तैरते हुए पाया जाता है जो दूर से देखने में हरे या लाल रंग की चटाईनुमा लगता है। इसकी पत्तियां बहुत छोटी तथा मोटी होती हैं। इन पत्तियों के नीचे छिद्रों में सहजीवी साइनो-वैक्टीरिया (एनावीना एजोली) पाया जाता है, जो नत्रजन स्थिरीकरण में सहायक है। यह जलमग्न धान के खेतों में बुवाई के एक सप्ताह बाद 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर  की दर से उगाया जा सकता है जो दो किलोग्राम नत्रजन प्रति दिन की दर से स्थिर कर सकता है। इसका प्रयोग कम्पोस्ट बनाने में अथवा 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से हरी खाद के रूप में भूमि में मिलाकर किया जा सकता है। इसके प्रयोग से धान में खरपतवार कम पनपते हैं तथा नत्रजन के प्रयोग में 40-80 किलोग्राम तक बचत की जा सकती है।

7. माइकोराइजा

इसमें फफूंदी का पौधें की जड़ों से सहजीवन होता है, जिसमें फफूंदी अपनी जड़ों से पोषक तत्वों को अवशोषित करती है और पौधों को इन तत्वों को तुरन्त उपलब्ध कराती है इसके प्रयोग से फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम एवं सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। इसके प्रयोग से वृद्धि वर्धक साइटोकाइनिन हार्मोन्स भी पौधों को उपलब्ध होता है।इसके प्रयोग से पौधों हेतु जल की उपलब्धता बढ़ता है।

जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि

1. बीज उपचार विधि : जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम विधि है। बीज उपचार हेतु 500 मि.ली.  पानी में लगभग 50 ग्राम गुड़ या गोंद उबालकर अच्छी तरह मिलाकर घोल बना लेते है। इस घोल को 10 किग्रा बीज पर छिड़क कर मिला देते हैं जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाये। तब जैव उर्वरक को छिड़क कर मिला दिया जाता है। इसके उपरान्त बीजों को छायादार जगह में सुखा लेते हैं। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिए।

2. पौध जड़ उपचार विधि : धान तथा सब्जी वाली फसलें जिनके पौधों की रोपाई की जाती है जैसे टमाटरफूलगोभी, पत्तागोभीप्याज आदि फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिए किसी चौड़े व छिछले पात्र में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम जैव उर्वरक मिला लेते है। इसके उपरान्त नर्सरी से पौधों को उखाड़कर तथा जड़ों से मिट्टी साफ करने के पश्चात् 50-100 पौधों को बण्डल में बांधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो देते हैं। इसके बाद तुरन्त रोपार्इ कर देते है।

3. कन्द उपचार विधि : गन्नाआलूअदरकअरबी,हल्दी,जिमीकंद  आदि फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों/बीज टुकड़ों को उपचारित किया जाता है। एक किलोग्राम जैव उर्वरक का 20-25  लीटर पानी में घोलकर  बना लेते हैं। इसके उपरान्त कन्दों/बीज टुकड़ों  को 10 मिनट तक घोल में डुबोकर रखने के पश्चात बुवाई कर देते है।

4.मृदा उपचार विधि : जैव उर्वरक  8-10 किलोग्राम  को 80-100 किग्रा मिट्टी या कम्पोस्ट में मिलाका र मिश्रण तैयार करके अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला देते है।

जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियॉ

Ø जीवाणु खाद को धूप व गर्मी से दूर सूखे एवं ठण्डे स्थान पर रखें।

Ø जीवाणु खाद या इससे उपचारित बीजों को किसी भी रसायन या रासायनिक उर्वरकों  के साथ न मिलायें।

Ø राइजोबियम जीवाणु कल्फचर सल विशिष्ट होता है। अतः पैकेट पर अंकित फसल में ही इसका प्रयोग करें।

Ø यदि बीजों पर फफूंदनाशी बेविस्टीन का प्रयोग करना हो तो बीजों को पहले फफूंद नाशी से उपचारित करें तथा फिर जीवाणु खाद की दुगुनी मात्रा से उपचारित करें।

Ø जैव उर्वरकों को पैकेट पर लिखी अन्तिम तिथि से पहले ही इस्तेमाल कर लेना चाहिए

Ø जैव उर्वरक और रासायनिक खादों को उचित मात्रा एवं तरीके से उपयोग करना चाहिए।

संक्षेप में हम कह सकते है कि जैव उर्वरक रासायनिक उर्वरकों का विकल्प तो नहीं बन सकते है परन्तु जैविक एवं रासायनिक उर्वरकों के साथ यदि इनका इस्तेमाल समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन के तहत एक पूरक के रूप में किया जाता है तो मृदा की उर्वरता बढ़ने के साथ-साथ खेती में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम कर खेती के लाभ को बढाया जा सकता है 

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