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सोमवार, 24 जून 2019

जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि को बचाने के उपाय


        जलवायु परिवर्तन से भारतीय कृषि को बचाने के उपाय 
डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्रोफ़ेसर, इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय,
राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)

भारत का सम्पूर्ण क्षेत्रफल लगभग ३२.४४ करोड़ हेक्टेयर है जिसमें से १४.२६ करोड़ हेक्टेयर यानि सम्पूर्ण क्षेत्र के ४७ % हिस्से में में खेती होती है. आज भी देश की ७० फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है जिसमें से ८० % की जीविका खेती-किसानी पर आश्रित है. इस प्रकार देश की बहुसंख्यक आबादी की रोजी रोटी  कृषि पर ही निर्भर करती है. अतः  कृषि में जरा सा उतार-चढ़ाव हमारे ताने बाने को बिगाड़ सकता है. आने वाले ३५-४० वर्षों में ४० % हिमालय ग्लेशियर पिघल कर समाप्त हो सकते है. समुद्र का जल स्तर बढ़ने से ७५०० किमी तटीय क्षेत्र व् ५० करोड़ लोगों का जीवन खतरे में पड़ सकता है. तटीय शहर एवं द्वीप जलमग्न हो सकते है. जल का स्तर घटेगा एवं पानी का संकट बढेगा.बाढ़ एवं सूखे की प्रवृति बढ़ेगी.भूमि की उर्वरा शक्ति में गिरावट होगी.कृषि की उत्पादकता घटेगी जिसके फलस्वरूप भूख एवं खाद्ध्य असुरक्षा बढ़ेगी. बहुत सी पादप वनस्पतियाँ एवं जंगली जानवर विलुप्त हो सकते है. ऐसा अनुमान है कि सूखे के कारण खरीफ की मुख्य फसलें यथा चावल, दलहन तथा तिलहन में 20 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। देश में खाद्य उत्पादन में 5 प्रतिशत कमी की संभावना है ।जलवायु परिवर्तन की वजह से कृषि के विभिन्न विधाएं  निम्न प्रकार से प्रभावित हो सकती हैं:
1. जलवायु परिवर्तन का फसलों पर प्रभाव: एक अध्ययन अनुसार यदि तापमान में 1 से 4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो खाद्य पदार्थों के उत्पादन में 24 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है । भारत में चावल के उत्पादन में तापमान बढ़ने से  2020 तक धान उत्पादन में  6 से 7 प्रतिशत एवं गेहूँ के उत्पादन में 5से 6 प्रतिशतआलु के उत्पादन में तीन प्रतिशत तथा सोयाबीन के उत्पादन में 3 से 4 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है ।  अध्ययनों से ज्ञात हुआ है की यदि तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की बढोत्तरी होती है तो अधिकांश स्थानों पर गेंहूँ की उत्पादकता में कमीं  आयेगी. प्रत्येक 1 सेंटीग्रेट तापमान बदने पर गेंहूँ का उत्पादन ४-५ करोड़ टन कम हो सकता है. तापमान वृद्धि के साथ-साथ धान के उत्पादन में भी गिरावट आने लगेगी.  जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित होगी बल्कि उनकी पोष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । फल एवं सब्जियों वाली फसलों में फूल तो खिलेंगे लेकिन उनसे फल या तो बहुत कम बनेंगे या उनकी पोष्टिकता प्रभावित होगी ।अनाज में पोषक तत्वों और प्रोटिन की कमी पाई जाएगी जिसके कारण संतुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा ।
2. जलवायु परिवर्तन का मृदा पर प्रभाव: भारत जैसे कृषि प्रदान देश के लिए मिट्टी की संरचना व उसकी उत्पादकता अहम स्थान रखती है। कृषि के एनी घटकों की भाँती मिट्टी भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होती है. तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी और कार्यक्षमता प्रभावित होगी । मिट्टी में लवणता बढ़ेगी और जैव विविधता घटती जाएगी । बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जहाँ एक और मिट्टी का क्षरण अधिक होगा वहीं दूसरी ओर सूखे की वजह से बंजरता बढ़ जाएगी । भूमिगत जल के स्तर में गिरावट के कारण भूमि की उर्वरता प्रभावित होगी जिससे फसलों का उत्पादन घटेगा.
3. जलवायु परिवर्तन का कीट व रोगों पर प्रभाव : जलवायु परिवर्तन से कीट व रोगों की मात्रा बढ़ेगी । गर्म जलवायु कीट पतंगों की प्रजनन क्षमता की वृद्धि में सहायक है । कीटों में वृद्धि के साथ ही उनके नियंत्रण हेतु अतधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाएगा जो जानवरो व मनुष्यों में अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देगा ।
4. जलवायु परिवर्तन का जल संसाधनों पर प्रभाव : जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव जल संसाधनों पर पड़ेगा । पूरे विश्व में पानी की खपत प्रत्येक २० साल में दुगुनी हो जाती है, जबकि धरती पर उपलब्ध पानी की मात्रा सीमित है. भारत में प्रति व्यक्ति जल का उपयोग मात्र ६१० घन मीटर प्रति वर्ष है जबकि ऑस्ट्रेलिया, अर्जेटीना, अमेरिका और कनाडा में यह १००० घन मीटर प्रतिव्यक्ति प्रति वर्ष से भी अधिक है. जलवायु परिवर्तन के कारण जल आपूर्ति की भंयकर समस्या उत्पन्न होगी तथा सूखे व बाढ़ की बारम्बारता में इजाफा होगा । अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में शुष्क मौसम अधिक लम्बा होगा जिससे फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । वर्षा की अनिश्चितता भी फसलों के उत्पादन को प्रभावित करेगी तथा जल स्रोतों के अधिक दोहन से जल स्रोतों पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे । अधिक तापमान व वर्षा की कमी से सिंचाई हेतु भू-जल संसाधनों का अधिक दोहन किया जाएगा । जिससे धीरे-धीरे भू-जल इतना ज्यादा नीचे चला जाएगा कि उसका दोहन करना आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी सिद्ध होगा जलवायु में होने वाला परिवर्तन हमारी राष्ट्रीय आय को प्रभावित कर रहा है । राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा कम होना चिंता का विषय है ।
5. जलवायु परिवर्तन का पशुओं पर प्रभाव : फसलों एवं पेड़-पौधों के साथ-साथ पशुओं पर भी जलवायु परिवर्तन का असर पड़ेगा. तापमान में बढ़ोत्तरी होने से पशुओं के दुग्ध उत्पादन एवं प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. अनुमान है की तापमान वृद्धि से दुग्ध उत्पादन में सन २०२० तक 1.६ करोड़ टन तथा २०५० तक १५ करोड़ टन की गिरावट आ सकती है. संकर नश्ल की गाय एवं भैंस गर्मी के प्रति कम सहनशील होती है अतः इनकी प्रजनन एवं दुग्ध उत्पादन क्षमता अदिक प्रभावित होगी.   
कृषि पर जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से निपटने के तरीके
        भारतीय कृषि पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के अनेक उपाय हैं जिनको अपनाकर हम कुछ हद तक जलवायु परितर्वन के प्रभावों से अपनी कृषि को बचा सकते हैं। वर्तमान कृषि प्रथाओं से हट कर वैकल्पिक प्रथाओं का उपयोग, बुवाई एवं कटाई के समय / में बदलाव, बीज की विविधता का विस्तार, सिंचाई के वैकल्पिक साधन, वैकल्पिक आजीविका का चुनाव, और फसल बाजारों का विनियमन कुछ प्रावधान हैं जिनका पालन जलवायु परिवर्तनशीलता में बदलते रुझानों को अनुकूलित करने के लिए  किया जा सकता है.प्रमुख उपाय इस प्रकार हैं –
1.खेतों में कुशल जल प्रबंधन :- तापमान वृद्धि के साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है । ऐसे में जमीन में नमी का संरक्षण व वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी एवं सहयोगी कदम हो सकता है । वाटरशैड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा के पानी को संचित कर सिंचाई के रूप में प्रयोग कर सकते हैं । इस से जहाँ एक ओर हमें सिंचाई की सुविधा मिलेगी वहीं दूसरी ओर भूजल पूनर्भरण में भी मदद मिलेगी । 
2.जैविक एवं समन्वित खेती :- खेतों में रासायनिक खादों व कीटनाशकों के इस्तेमाल से जहाँ एक ओर मृदा की उत्पादकता घटती है वहीं दूसरी और इनकी मात्रा भोजन श्रृंखला के माध्यम से मानव के शरीर में पहूँच जाती है । जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं । रासायनिक खेती से हरित गैसों के उत्सर्जन में भी हिजाफा होता है । अत: हमें जैविक खेती करने की तकनीको पर अधिक से अधिक जोर देना चाहिए । एकल कृषि की बजाय हमें समग्रित कृषि करनी चाहिए । एकल कृषि में जहाँ जोखिम अधिक होता है वहीं समग्रित कृषि में जोखिम कम होता है । समग्रित खेती में अनेकों फसलों का उत्पादन किया जाता है जिससे यदि एक फसल किसी प्रकोप से समाप्त् हो जाए तो दूसरी फसल से किसान की रोजी रोटी चल सकती है ।
3.नवीन का विकास :- जलवायु परिवर्तन के गम्भीर दूरगामी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए ऐसी किस्मों का विकास करना पड़ेगा जो बदलते मौसम के अनुकूल हों । हमें ऐसी किस्मों का विकास करना होगा जो अधिक तापमानसूखे व बाढ़ की विभिषिकाओं को सहन करने में सक्षम हों । हमें कीट-रोग प्रतिरोधी, लवणता एवं क्षारीयता को सहन करने वाली किस्मों को भी ईजाद करना होगा ।
4.फसली संयोजन में परिवर्तन :- जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हमें फसलों के प्रारूप एवं उनके बोने के समय में भी परिवर्तन करना पड़ेगा । मिश्रित खेती व इंटरक्रापिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता है । कृषि वानिकी अपनाकर भी हम जलवायु परितर्वन के खतरों से निजात पा सकते हैं ।
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से भारतीय कृषि को बचाने के लिए हमें अपने संसाधनों का न्यायसंगत इस्तेमाल करना होगा व भारतीय जीवन दर्शन को अपनाकर हमें अपने पारम्परिक ज्ञान को अमल में लाना पड़ेगा । अब इस बात की सख्त जरूरत है कि हमें खेती में ऐसे पर्यावरण मित्र तरीकों को अहमियत देनी होगी जिनसे हम अपनी मृदा की उत्पादकता को बरकरार रख सकें व अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचा सकें।

जलवायु परिवर्तन-संकट में जीवन : जिम्मेदार कौन ?

जलवायु परिवर्तन-संकट में जीवन : जिम्मेदार कौन ?
डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर
प्रोफ़ेसर, इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय,
राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)
पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर एक निश्चित जलवायु होती है जिसे वहां की वर्षा, धुप, हवा, तापमान, आदि मिलकर निर्धारित करते है.जलवायु में हमेशा कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है, जिससे कभी ठण्ड ज्यादा तो कभी गर्मी ज्यादा पड़ती है और धरती पर रहने वाले जिव-जंतु उससे अपना सामंजस्य बनाते रहते है।  बीते 100-150 वर्षो से जलवायु में तेजी से परिवर्तन देखने को मिल रहा है जिसकी वजह से बहुत से पेड़-पौधे और जिव जंतु इससे अनकूलन नहीं बैठा पा रहे है. इसकी वजह वैज्ञानिकों ने ग्रीन हाउस गैसों में बढोत्तरी बताया है. दरअसल हमारा पर्यावरण अनेक प्रकार की गैसों (78 % नाइट्रोजन, 21 % ऑक्सीजन और 1 % अन्य गैसों) से मिलकर बना है. इसमें 1 % अन्य  गैसों में ग्रीन हाउस गैसे यथा कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, फ्लोरोकार्बन आदि शामिल है. यह ग्रीन हौस पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच के समान कार्य करती है. ये धरती की प्राकृतिक तापमान नियंत्रक है. वर्तमान विश्व में बढ़ते औद्योगिकरण एवं बढ़ते वाहनों की संख्या से ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में इजाफा हुआ है । बढ़ती ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन से वैश्विक तापमान में वृद्धि एवं जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाओं ने समस्त विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है । ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इन्डेक्स 2010 के अनुसार, भारत जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित देशों में छठे स्थान पर है, जो कि देश में बाढ़, चक्रवात, और सूखे जैसी प्रकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति से  स्पष्ट हो जाता है। जलवायु परिवर्तन मानसून को प्रभावित करता है और भारतीय कृषि मानसून पर ही निर्भर है। मानसून का समय पर आगमन और पर्याप्तता  कृषि की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका है।  जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून अवधि में कमीं तथा वर्षा जल की मात्रा में निरंतर गिरावट के कारण हमारी कृषि अर्थव्यस्था बेपटरी होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन से कृषि केवल प्रभावित ही नहीं हो रही है वरन वह जलवायु परिवर्तन में योगदान भी दे रही है. मौसम के बदलाव हेतु जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कृषि भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।  कृषि से ही मीथेन एवं नाइट्रस ऑक्साइड गैस का सबसे अधिक उत्सर्जन होता है। 

जलवायु परिवर्तन :  आखिर जिम्मेदार कौन ?

          पृथ्वी गतिशील है और प्राकृतिक रूप से इसकी जलवायु में कुछ न कुछ परिवर्तन आता रहताहै.जलवायु परिवर्तन के दो कारण है एक तो प्राकृतिक और दूसरा मानव जनित कारण महाद्वीपों का अपने स्थान से खिसकना अथवा धरती के निचे स्थित प्लेटों का चलना. उदहारण के लिए हिमालय पर्वत का प्रतिवर्ष 1 मि.मी. बड़ते जाना आदि ऐसी घटनाएं है जो पूरी तरह से प्राकृतिक है।  ज्वालामुखी पर्वत फटने से लाखों टन सल्फर डाइ ऑक्साइड, राख, धुल और एनी गैसे वातावरण में बिखेर देते है, जिससे सूर्य की किरणों का पृथ्वी पर आना अवरुद्ध हो जाता है और उस क्षेत्र की जलवायु प्रभावित होती है।  समुद्र की लहरें भी जलवायु परिवर्तन में सहायक है. वातावरण एवं जमीन की अपेक्षा समुद्र सूर्य की दुगुनी ऊर्जा को अवशोषित करता है, जिससे वाष्पीकरण बढता है और ग्रीन हाउस गैसों में बढोत्तरी होती है।  इस प्रकार से बहुत से प्राकृतिक कारक है जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होते है परन्तु यह सभी सैकड़ों वर्षों में अपना प्रभाव दिखाते है। प्रकृति के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन पर हमारा वश नहीं है परन्तु प्राकृतिक संतुलन बनाने में हम महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते है। 

हम ही प्रभावित और हम ही जलवायु परिवर्तन के जिम्मेदार  

            जलवायु परिवर्तन में  मुख्य भूमिका मानवीय कारकों की ही मानी जाती है क्योंकि प्रकृति जन्य परिवर्तन तो हमेशा से होता आया है. ग्रीन हाउस गैसों में बढ़ोत्तरी हेतु हमारे द्वारा किये जा रहे विकास और विलासितापूर्ण जीवन के लिए जुटाए जा रहे साधन जिम्मेदार है, जैसे-
1.तीव्र उद्योगिकीकरण: अंधाधुंध औद्योगीकरण में व्यापक पैमाने पर फ़ॉसिल फ्यूल (डीजल, पेट्रोल,कोयला) का उपयोग किया जा रहा है  और प्रदूषण फ़ैलाने में आज उद्योग-कल कारखाने सबसे अग्रणी है।  उद्योग संचालन में अत्यधिक कोयले व बिजली की खपत  भी ग्रीन हाउस गैसों को बढावा दे रही है। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली कार्बनडाइ ऑक्साइड से शहरों का तापमान बढ़ रहा है। 
2. ऊर्जा खपत: बिजली प्रतिष्ठानों में ताप पैदा करने में, मोटरगाड़ी एवं उद्योगों में प्राकृतिक ईधन, गैस एवं कोयले की सबसे अधिक खपत होती है. इनके जलने से कार्बनडाइ ऑक्साइड गैस निकलती है जिससे वायुमंडल प्रदूषित हो रहा है। 
3. वनों का विनाश एवं पेड़ों की कटाई:वनों एवं पेड़ पौधों के कम होने से पर्यावरण में प्रदूषण की मात्रा में इजाफा हो रहा है।  जंगल एवं पेड-पौधे वायु मंडल से कार्बनडाइ ऑक्साइड शोषित कर जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने में सहायक होते है. वनों की अंधाधुंध कटाई से न केवल परिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ा है बल्कि वनोपज पर आश्रित रहने वाले आदिवासी समुदाय के लिए आजीविका का संकट भी उत्पन्न हो गया है। 
4. जनसँख्या वृद्धि: तेजी से बढ़ रही जनसंख्या  भी जलवायु परिवर्तन में अहम भूमिका निभा रही है।  हमारे प्राकृतिक साधन सीमित मात्रा में उपलब्ध है, परन्तु बढती आबादी की जरुरत के कारण इन ससाधनों का असीमित और अनियमित दोहन किया जाने लगा है।  मिट्टी, पानी, हवा के अनियमित दोहन से प्रदुषण बदने के साथ-साथ इनकी उपलब्धतता और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। 
5.भूमि उपयोग एवं कृषि क्रियाओं में बदलाव: आज अनेक स्थानों पर जंगलों को काटकर फसलों का उत्पादन अथवा खेती योग्य जमीनों को रिहायसी अथवा ओद्योगिक प्रयोजन में बदलने से भी जलवायु परिवर्तन हो रहा है अधिक उत्पादन के वास्ते फसलों में अंधाधुंध तरीके से रासयनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का इस्तेमाल, कृषि अवशेषों को जलाना, अधिक पानी चाहने वाली फसलों की खेती करने से भी जलवायु परिवर्तित हो रहा है 

घातक है विलासिता पूर्ण जीवन 

             सूर्य की पराबैगनी किरणों से धरती की रक्षा करने वाली ओजोन परत में छेद होने की भनक होते ही इसकी सुरक्षा के लिए दुनिया भर के नेताओं ने मोंट्रियल संधि करने का फैसला किया जिसके तहत ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाली गैस क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (CFCs) में कटौती की बात कही गई थी।  इस गैस को रेफ्रिजरेटर्स, एयरकंडीशनर के अलावा हेयरस्प्रे,डियोडरेंट आदि में इस्तेमाल किया जाता था।  ज्ञात हो कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स के अपघटन से निकलने वाली गैस क्लोरीन ओजोन परत को प्रभावित करती है.बिलासितापूर्ण जीवन शैली के लिए इस्तेमाल की जा रही सुविधाओं और वस्तुओं से हम जाने-अनजाने में हम अपने ही पर्यावरण को नष्ट करने पर आमादा है यद्यपि मोंट्रियल प्रोटोकाल के असर से  इस गैस के उत्सर्जन में कमीं तो आई परन्तु क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स की जगह हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) का इस्तेमाल किया जाने लगा. मगर अब दुनिया को हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के दुष्प्रभावों की चिंता सताने लगी है क्योंकि इसमें मौजूद फ्लोरीन क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स की क्लोरीन से कहीं अधिक खतरनाक है।  हाइड्रोफ्लोरोकार्बन न केवल ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि ग्लोबल वार्मिंग में भी ज्यादा योगदान दे रही है एक बार उत्सर्जन के बाद यह गैस वातावरण में लगभग 15  वर्ष तक बनी रहती है जबकि कार्बन डाइऑक्साइड पांच सदी तक वातावरण में रहती है, परन्तु ग्लोबल वार्मिंग में हाइड्रोफ्लोरोकार्बन का योगदान  कार्बन डाइऑक्साइड से हजारों गुना ज्यादा होता है. इसी वजह से रवांडा की राजधानी किगाली में 197  देशों के नेताओं ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन के उत्सर्जन में कटौती का प्रण लिया है, परन्तु अभी भी इस खतरनाक गैस का उत्सर्जन सालाना 7-15  प्रतिशत की दर से बढ़ता जा रहा है।  वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ने से तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है. ज्ञात हो ग्रीन हाउस गैसों में सबसे खतरनाक हाइड्रोफ्लोरोकार्बन  है, जिसके उत्सर्जन में कमीं नहीं की गई तो इस सदी के अंत तक तापमान में 0.5  डिग्री सेल्सियस का इजाफा हो सकता है. यदि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा इसी प्रकार से बढती रही तो हमारी धरती भी एक दिन  मंगल और शुक्र गृह की भांति जीवन रहित हो जाएगी।

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गुरुवार, 13 जून 2019

बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक है धान की स्वस्थ पौध


बेहतर उत्पादन के लिए आवश्यक है धान की स्वस्थ पौध
डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर, प्रोफ़ेसर (सस्य विज्ञान)
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय,
राज मोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,
अंबिकापुर (छत्तीसगढ़)

        धान उत्पादक देशों में क्षेत्रफल एवं उत्पादन  के हिसाब से भारत का क्रमशः  प्रथम एवं द्वितीय स्थान है परन्तु हमारे देश में धान की औसत उपज विश्व औसतमान 4112 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर) से काफी कम (3124 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर) है।   हमारी उत्पादकता इजिप्ट, जापान,चीन, वियतनाम, अमेरिका, इंडोनेशिया देशों की तुलना में बहुत कम है।   भूमि एवं जल का अकुशल प्रबंधन एवं धान उगाने की पुरातन पद्धति के कारण हमारे देश में धान की उपज कम आती है. भारत में धान की खेती शुष्क, अर्द्ध शुष्क एवं नम परिस्थितियों में की जाती है।  शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क पद्धति से धान की खेती वर्षा पर आधारित है जबकि नम पद्धति सुनिश्चित वर्षा एवं सिंचित क्षेत्रों में की जाती है।  सुनिश्चित वर्षा एवं सिंचित क्षेत्रों में धान की खेती रोपण पद्धति से की जाती है।  रोपण पद्धति में धान की बेहतर पैदावार के लिए धान की उन्नत व स्वस्थ पौध तैयार करना अत्यन्त आवश्यक रहता है।  इसके लिए उत्तम किस्म के प्रमाणित बीज का चुनाव, पौध क्यारी के लिए उपयुक्त जगह, उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरक डालना, खरपतवार नियंत्रण, समय पर सिंचाई एवं पौध सरंक्षण के उपाय अपनाना नितांत आवश्यक है। 
धान की पौधशाला फोटो  साभार गूगल
धान की स्वस्थ पौध ऐसे तैयार करें 
किसान भाई अधोप्रस्तुत उन्नत तकनीक से धान की अच्छी पौध तैयार कर बेहतर उप्तादन प्राप्त कर सकते है:

खेत का चुनाव व तैयारी : पौधशाला ऐसी भूमि में तैयार करनी चाहिए जो उपजाऊ, अच्छे जल निकास वाली व जल स्त्रोत के नजदीक हो।  धान की पौध शाला स्थापित करने  के लिए चिकनी दोमट या दोमट मिट्टी का चुनाव करें।  खेत की 2 से 3 जुताई कर के खेत को समतल व खेत की मिट्टी को भुरभुरी कर लें।  खेत को समतल कर के करीब 1 से डेढ़ मीटर चौड़ी, 10 से 15 सेंटीमीटर ऊंची व आवश्यकतानुसार लंबी क्यारियां बनाएं।  एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की रोपाई  के लिए 1/10 हेक्टेयर (1000 वर्गमीटर) क्षेत्रफल  में पौध तैयार करना पर्याप्त होता है।  खेत की ढाल के अनुसार नर्सरी में सिंचाई व जल निकास की नालियां बनाएं।
पौधशाला में बुवाई का समय: धान की पौधशाला की बुवाई का सही समय वैसे तो जलवायु, संसाधन एवं विभिन्न किस्मों पर निर्भर करता है, लेकिन 15 मई से लेकर 20 जून तक का समय बुवाई के लिए उपयुक्त पाया गया है।  मध्यम व देर से पकने वाली किस्मों की बोआई मई के अंतिम हफ्ते से जून के प्रथम पखवाड़े तक  करें।  जल्दी पकने वाली किस्मों की बोआई जून के दूसरे पखवाड़े तक कर लेना चाहिए।
बीज का चयन: अपने क्षेत्र एवं जलवायु परिस्थिति के लिए अनुशंसित धान का बीज किसी विश्वसनीय स्त्रोत से ही क्रय करना चाहिए।  यदि खुद का बीज प्रयोग रखना हो तो ऐसे खेत से लें जिसमे कीड़े-बीमारी का प्रकोप न हुआ हो।  अपना बीज प्रयोग करना है तो बुवाई से पहले स्वस्थ बीजों की छटनी आवश्यक है।  इसके लिए 10 प्रतिशत नमक के घोल का प्रयोग करते है।  नमक का घोल बनाने के लिए 2 किग्रा सामान्य नमक 20 लीटर पानी में घोल लें और इस घोल में 30 किग्रा बीज डालकर अच्छी प्रकार से हिलाएं।  इससे स्वस्थ एवं भारी बीज नीचे बैठ जायेंगे और हल्के-थोथे बीज ऊपर तैरने लगेंगे।
बीज की मात्रा : धान की मोटे दाने वाली किस्मों के लिए 25 से 30  किलोग्राम व बारीक दाने वाली किस्मों के लिए 20 से 25 किलोग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत होती है। संकर धान 15 से 20  किलोग्राम प्रति हेक्टेयर लगता है।  पौधशाला के लिए तैयार की गई क्यारियों में उपचारित किए गए सूखे बीज की 50 से 80 ग्राम मात्रा का प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से छिड़काव करें.नर्सरी में ज्यादा बीज डालने से पौधे कमजोर रहते हैं और उन के सड़ने का भी डर रहता है।
बीज उपचार: बीजजतिन रोगों से पौधों की सुरक्षा हेतु बीजों का उपचार किया जाता है।  बीज उपचार के लिए 10 ग्राम बाविस्टीन और 2.5 ग्राम पोसामाइसीन या 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को 25 लीटर पानी में घोल कर उसमें  छांटे  हुए बीजों को 24 घंटे भिगो कर व सुखा कर बोआई करें।  इस उपचार से जड़ गलन, झोंका (ब्लास्ट) एवं पत्ती झुलसा रोग आदि बिमारियों के नियंत्रण में सहायता मिलती है. आज कल धान उगाने वाले क्षेत्रों में सूत्रकृमि की समस्या देखने को मिल रही है।  इससे प्रभावित पौधों की जड़ें भूरी से लाल-भूरे रंग की हो जाती है, जिससे जड़ों की बढ़वार रुक जाती है और पौधे पीले हो जाते है।  पौधशाला में सूत्रकृमि  के प्रकोप की संभावना होने पर पौधशाला के एक वर्ग मीटर स्थान में 3-4 ग्राम कार्बोफ्युरान (फ्युराडान 3-जी) का प्रयोग करें।
बोआई की विधि : बीजों को अंकुरित करने के बाद ही बिजाई करें।  अंकुरित करने के लिए बीजों को जूट के बोरे में डाल कर 16 से 20 घंटे के लिए पानी में भिगो दें।  इस के बाद पानी से निकाल कर बीजों को सुरक्षित जगह पर सुखा कर बिजाई के काम में लें।  बनाई गई क्यारियों में प्रति वर्ग मीटर 40 ग्राम बारीक धान या 50 ग्राम मोटे धान का बीज बीजोपचार के बाद 10 सेंटीमीटर दूरी पर कतारों में 2 से 3 सेंटीमीटर गहरा बोएं।  संकर धान के बीज की 20 से 25 ग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से बुआई करें।  बीजों को पौधशाला में सीधा बोने पर 3 से 4 दिनों तक चिडि़या आदि पक्षियों से बचाव करें जब तक कि बीज उग न जाएं।
पौधशाला में खाद व उर्वरक : प्रतिवर्ग मीटर पौधशाला में 10 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 5 ग्राम यूरिया अच्छी तरह मिलाना चाहिए। यदि रोपणी में पौधे नत्रजन की कमी के कारण पीले दिखाई दें तो 15 से 30 ग्राम अमोनियम सल्फेट या 7 से 15 ग्राम यूरिया प्रति वर्ग मीटर रोपणी में देवें।  लौह तत्व की कमी वाले क्षेत्रों में 0.5 प्रतिशत फैरस सल्फेट के घोल के 2-3  छिडकाव (एक सप्ताह के अन्तराल पर) करने से पौधों में हरिमाहीनता (क्लोरोसिस) की समस्या से निजात मिल जाती है।  रोपाई में विलम्ब होने की संभावना हो तो नर्सरी में नत्रजन की टाप ड्रेसिंग न करें।रोपणी में यदि खरपतवार हो तो उन्हें निकालने के बाद ही नत्रजन का प्रयोग करें।
सिंचाई एवं जल निकास : बोआई के समय खेत की सतह से पानी निकाल दें और बोआई के 3 से 4 दिनों तक केवल खेत की सतह को पानी से तर रखें। जब अंकुर 5 सेंटीमीटर के हो जाएं, तो खेत में 1 से 2 सेंटीमीटर पानी भर दें. ज्यादा पानी होने पर पानी को खेत से निकाल देना चाहिए। 
खरपतवार नियंत्रण :  पौधशाला में खरपतवारों की रोकथाम के लिए   बुवाई के 1-3 बाद 1.5 कि.ग्रा. सोफिट (प्रेटीलाक्लोर 30 ई सी + सेफनर) प्रति हेक्टेयर को 150 कि.ग्रा. सूखी रेत  में मिलाकर प्रयोग करने से काफी हद तक खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है।  पौध शय्या में  बुवाई के 10-12 दिन बाद निराई अवश्य करें. सोफिट के अभाव में ब्युटाक्लोर (मचैटी) 50 ई सी या बेन्थियोकार्ब नामक शाकनाशियों की 2.5 लीटर मात्रा को 150 कि.ग्रा. सूखी रेत में मिलाकर अंकुरित धान बोने के 6 दिन बाद प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
रोपाई का समय : कम अवधि वाली बौनी किस्मों की रोपाई जुलाई के प्रथम सप्ताह से लेकर जुलाई अंत तक करना चाहिए।  मध्यम अवधि वाली बौनी किस्मों एवं संकर धान की रोपाई 15 जुलाई तक संपन्न कर लेना चाहिए।
रोपाई के लिए पौध की उपयुक्त आयु  : शीघ  अर्थात कम समय में पकने वाली धान की बौनी  किस्मों की रोपाई 20 से 25 दिन के अन्दर (4-6 पत्ती अवस्था पर) कर देना चाहिए । मध्यम या देर से पकने वाली किस्मों की रोपणी की उम्र 25 से 30 दिन उपयुक्त होती है।
रोपाई हेतु मुख्य खेत की तैयारी: यदि धान के मुख्य खेत में हरी खाद वाली फसल ढैंचा आदि  लगाई गई हो तो रोपाई के 6-8 दिन पूर्व ही हरी खाद को रोटावेटर चलाकर  मिट्टी में मिला देना चाहिए । मुख्य खेत में मचाई का कार्य रोटावेटर से करना चाहिए, इससे मचाई शीघ्र होने के साथ-साथ पानी की भी बचत होती है।  यदि खेत ऊँचा-नीचा हो तो पाटा चलाकार समतल कर लें। इसी समय उर्वरकों की आधार मात्रा प्रदान करें। पौध रोपण से पहले खेत में पानी भर देवें।
पौध उखाड़ना: रोपाई के लिए पौध को क्यारियों से उखाड़ने से 5 से 6 दिन पहले 1 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति 100 वर्ग मीटर नर्सरी के हिसाब से देते हैं ताकि स्वस्थ पौध मिल सकें।  पौध उखाड़ने के एक दिन पहले पौधशाला में पानी भर देना चाहिए, जिससे पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सके और पौध की जड़ों को कम से कम नुकसान हो।  रोपाई के समय पौध निकाल कर पौधों की जड़ों को पानी में डुबो कर रखें।  पौध को क्यारियों से निकालने के दिन ही रोपाई करना उपयुक्त  होता है। 
रोपाई का तरीका: धान पौध की रोपाई कतारों में करें।  कतारों व पौधों के बीच की दूरी 20 x 10 से.मी. (शीघ्र व मध्यम समय में तैयार होने वाली किस्में) तथा 20 x 15 से.मी. (देर से तैयार होने वाली किस्मों) रखना चाहिए।  कम उर्वरता वाले क्षेत्रों तथा देर से रोपाई की स्थिति में नजदीकी रोपाई लाभकारी होती है।  रोपा लगाते समय एक स्थान (हिल)पर 2 से 3 पौधों की रोपाई करें। पौधे सदैव सीधी लगाना चाहिए एंव गारा बैठने पर  पौध को  2-3 से.मी. की  गहराई पर ही लगाए। ऐसा करने से पौध शीघ्र स्थापित हो जाती है।  कल्ले अधिक बनते है और फूल भी एक साथ आते है । 
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