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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

राष्ट्रिय आय में महिलाओं के योगदान की अपेक्षा कब तक

डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर

प्रोफ़ेसर (सस्यविज्ञान)

इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय,कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,

कोडार रिसोर्ट, कांपा, महासमुंद (छत्तीसगढ़)

 

 सूर्योदय  से लेकर सूर्यास्त और रात्रि तक महिलाएं विविध घरेलू कार्यों एवं पारिवारिक-सामाजिक दायित्वों का निर्वहन सुचारू व व्यवस्थित ढंग से करते हुए अपनी कार्यकुशलता, सहनशीलता, धैर्य व समर्पण का परिचय बखूबी से देती आ रही है। यही नहीं, ग्रामीण महिलाएं घर एवं रसोई के कार्यों के अतिरिक्त खेती-बाड़ी, बागवानी,पशुपालन, मछली पालन, मुर्गी पालन से सम्बंधित बहुआयामी  कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाती है। निर्माण सम्बन्धी कार्यों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी कं नहीं है। इसके अलावा लघु, कुटीर, हस्तकला व् दस्तकारी उद्योगों में भी अपने कौशल, सृजनात्मक शक्ति व चातुर्य के बलबूते पर अपना वर्चस्व कायम किये हुए है। शहरों की तुलना में ग्रामीण महिलाओं के पास कार्य की अधिकता है, इसके विपरीत आज भी महिलाओं की स्थिति दयनीय है। सबसे अधिक कार्य का बोझ होने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम पारिश्रमिक  मिलता है जो उनकी दयनीय स्थिति को दर्शाता है।

महिलाओं द्वारा धान  की रोपाई फोटो साभार गूगल 
वर्तमान में तकनीक व प्रौद्योगिकी युग में उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर देश के विकास में महती भूमिका अदा कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य,रक्षा, सेना,पुलिस,विज्ञान,खेलकूद, पत्रकारिता, मनोरंजन, प्रशासनिक, राजनैतिक  आदि सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी व् सहभागिता उतरोत्तर बढती जा रही है, जो निश्चित रूप से महिला सशक्तिकरण की अवधारणा का यथार्थ रूप ही है। किन्तु विडम्बना का विषय यह है कि देश के विकास में आधे से अधिक का योगदान देने वाली महिलाओं द्वारा सम्पादित विविध घरेलु कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन नहीं होने के कारण ये राष्ट्रीय आय में समावेशित होने से वंचित रह जाती है । ज्ञात रहे कि राष्ट्रिय आय में बाजारोन्मुखी गतिविधियों को ही शामिल किया जाता है। इसी वजह से महिलाओं द्वारा सम्पादित विविध घरेलू कार्य एवं खेती-किसानी, पशुपालन, प्रसंस्करण से सम्बंधित कार्य राष्ट्रिय आय की परिधि से बाहर रह जाते है। हमारे देश की नीति और नियमों में कितना विरोधाभास है कि जब इन सभी घरेलू व अन्य कार्यो का संपादन नौकर अथवा बाजार व्यवस्था के तहत किया जाता है, तब वे राष्ट्रिय आय का अभिन्न अंग बन जाते है। महिलाओं द्वारा सम्पादित कार्यों का आर्थिक मूल्यांकन नहीं होने की वजह से उनके द्वारा प्रतिपादित श्रमसाध्य कार्य नजरअंदाज हो जाते है, जिसका खामियाजा महिला वर्ग को उठाना पड़ता है और इसी विसंगति के कारण समाज, देश व विश्व के विकास में उनके योगदान को अनदेखा कर दिया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया हा कि देश के अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान को या तो पहचाना नहीं गया है या फिर उसका सहीं तरीके से मूल्यांकन नहीं किया गया है. जबकि इसमें कोई अतिसयोंक्ति नहीं है की आज के आर्थिक एवं भौतिकवादी  युग में आर्थिक क्रियाओं के स्तर व् इनमें सहभागिता के आधार पर ही पद,प्रतिष्ठा और परिस्थिति का निर्धारण होता है. अतः यह नितांत आवश्यक हो जाता है की महिलाओं द्वारा सम्पादित घरेलू कार्यों एवं असंगठित क्षेत्रों यथा कृषि, बागवानी, पशुपालन, कुटीर उद्योग, निर्माण आदि क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं के महत्वपूर्ण योगदान का न्यायोचित मूल्यांकन करने हेतु ठोस रणनीत बनाई जानी चाहिए।

कृषि में महिलाओं का अभूतपूर्व योगदान

भारत अपने अस्तित्वकाल से ही कृषि प्रधान देश रहा है। महिलाओं के बगैर खेती-किसानी, बागवानी, पशुपालन और कुटीर उद्योगों की सफलता संभव नहीं हो सकती है. पिछली जनगणना (2011) के अनुसार, देश की  कुल महिला श्रमिकों की संख्या का 55% कृषि कार्य में और 24% कृषि मज़दूर के अंतर्गत कार्यरत थीं। किंतु भू-स्वामित्व  पर महिलाओं का स्वामित्व केवल 12.8% है जो लैंगिक असमानता को दर्शाता है। विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन के आंकड़े बता रहे हैं कि भारत के 48 प्रतिशत कृषि संबंधित रोजगार में महिलाएं हैं, जबकि करीब 7.5 करोड़ महिलाएं दुग्ध उत्पादन तथा पशुधन व्यवसाय जैसी गतिविधियों में सार्थक भूमिका निभाती हैं। कृषि क्षेत्र में कुल श्रम की 60 से 80 फीसदी तक हिस्सेदारी महिलाओं की है। पहाड़ी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तथा केरल राज्य में महिलाओं का योगदान कृषि तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पुरुषों से कहीं ज्यादा है। भारत वर्ष में उसके भूगोल और जनसंख्या के अनुपात से कृषि में महिलाओं के योगदान का आंकलन करें, तो यह करीब 32 प्रतिशत है। घरेलू कार्यो के अतिरिक्त बुवाई से लेकर रोपाई, सिंचाई, गुड़ाई, उर्वरक डालना, पौध संरक्षण, कटाई, गहाई, भंडारण और कृषि से जुड़े अन्य कार्य जैसे कि मवेशी प्रबंधन, चारे का संग्रह, दुग्ध संग्रहण, मधुमक्खी पालन, मशरुम उत्पादन, बकरी पालन, मुर्गी पालन आदि में महिलाओं का अधिक योगदान हैं। वर्षों से इतना भारी-भरकम कृषि कार्य करने वाली अधिकांश भारतीय महिलाओं को घर और खेत में कोई हक नहीं है अर्थात भू-स्वामित्व में उनकी हिस्सेदारी नहीं है. महिला सशक्तिकरण का नारा देने वाले देश में खेती-किसानी में हाड़तोड़ मेहनत करने वाली महिलाओं को किसान का दर्जा भी अभी तक नहीं मिल सका है। दरअसल, खेती-किसानी में कार्यरत महिलाओं के कार्य का आर्थिक मूल्यांकन नहीं होने के कारण हम  अपनी मातृशक्ति की श्रमपूंजी के साथ न्याय नहीं कर पा रहे है। आज भी किसान भाइयों को ही अन्नदाता की मान्यता है, जबकि बहिनों के बलबूते खेती हो रही है। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी महिलाओं को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उचित अवसर नहीं  दिए जा रहे हैं। आज भी खेती की सफलता से सम्बंधित प्रशिक्षण हो या फिर पुरुष्कार, सभी पर पुरुष वर्ग का ही कब्ज़ा है।

              निसंदेह महिलाओं द्वारा सम्पादित विविध किन्तु महत्वपूर्ण कार्यों का उचित आर्थिक मूल्यांकन होने से घरेलू महिलाओं एवं कृषि उत्पादक कार्यों में संलग्न महिलों के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में सुधार होगा जिससे इन महिलाओं के प्रति समाज की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन होगा जिसके फलस्वरूप उन्हें शोषण,उत्पीडन और प्रताड़ना से मुक्ति मिलेगी महिलाओं के विकास, उनके मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि होने से स्वतः ही परिवार, समाज, गाँव, शहर व् देश का तीव्र गति से  विकास होगा और हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल हो जायेगा  
कृपया ध्यान रखें:  कृपया इस लेख के लेखक ब्लॉगर  की अनुमति के बिना इस आलेख को अन्यंत्र कहीं पत्र-पत्रिकाओं या इन्टरनेट पर  प्रकाशित करने की चेष्टा न करें । यदि आपको यह आलेख अपनी पत्रिका में प्रकाशित करना ही है, तो लेख में ब्लॉग का नाम,लेखक का नाम और पते का उल्लेख  करना अनिवार्य  रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे।  लेख प्रकाशित करने की सूचना  लेखक के मेल  profgstomar@gmail .com  पर देने का कष्ट करेंगे। 

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

रासायनिक उर्वरकों (रासायनिक खेती) का प्रयोग कब, कैसे और किसने किया

डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर 
प्रोफ़ेसर, कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र,
कांपा, पोस्ट बिरकोनी, जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़)

            रासायनिक उर्वरकों पर आधारित आधुनिक खेती की शुरुआत 1840 में जर्मनी में हुई. इससे पूर्व पूरे विश्व में सजीव यानि जैविक खेती हुआ करती थी  जर्मनी में 1840 में प्रसिद्ध केमिस्ट जस्टस वोन लाइबिग ने रासायनिक उर्वरक का मेमोरेंडम प्रसिद्ध किया।  उन्होंने रासायनिक उर्वरकों पर पॉट कल्चर प्रयोग किया। जस्टस वोन लाइबिग कृषि वैज्ञानिक नहीं थे, अतः कृषि वैज्ञानिक जोह्न्सन ने रासायनिक उर्वरकों का खेत में परीक्षण  किया। प्रथम दो वर्ष में फसल उत्पादन अच्छा मिला। यह जानकार जर्मनी की सभी युद्ध का सामन बनाने वाली फैक्टरी रासायनिक उर्वरक बनाने लगी। अगले दो साल बाद फसलों का उत्पादन कम होने लगा। उर्वरकों के प्रयोग से भूमि में लाभदायक जीवाणु की संख्या घटने लगी तथा सभी फसलों और वनस्पतियों में रोगों का प्रकोप बढ़ने लगा। इसके बावजूद भी रासायनिक उर्वरकों एवं कीट नाशकों का प्रयोग   बढ़ने लगा जिसके परिणामस्वरूप रसायनयुक्त वनस्पति एवं चारे को खाने वाले पशु रोगग्रस्त होने लगे। पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए पशु औषधालयों की आवश्यकता पड़ने लगी।  
         यूरोप में औद्योगिक क्रांति के साथ-साथ ग्रामीण जनता औद्योगिक नगरों में रहने लगें। रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित खाद्यान्न के सेवन से शहरी जनता में बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगा जिससे अस्पताल और चिकित्स्कों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने लगी। लोगों में ह्रदय आघात, मधुमेह, रक्त चाप, कैंसर, किडनी व लिवर रोग जैसी  समस्यायें उत्पन्न होने लगी। 
            अपनी मौत के पहले जस्टस वोन लाइबिग ने लिखा-'मेरा रासायनिक उर्वरक' का 1840 का मेमोरेंडम गलत था।  रासायनिक उर्वरकों पर सभी संसोधन कृषि वैज्ञानिक डॉ जोह्न्सन ने मेरे नाम से प्रसिद्ध किये। समग्र मानव जाती को रोगी बनाने का पाप मैंने किया है। मैं ईश्वर से माफ़ी मांगता हूँ। मैं अंधा हो गया हूँ।  ईश्वर ने मुझे दण्डित किया है। रासायनिक खेती का सिद्धांत गलत है। मुझे माफ़ करना !  
         भारत के किसानों को आधुनिक रासायनिक खेती सीखने के लिए    ब्रिटिश वैज्ञानिक सर आल्बर्ट (1910-1940) भारत आया परन्तु भारत के किसानों की सजीव खेती देखकर वह खुद जैविक खेती (organic farming) का वैज्ञानिक बन गया। उन्होंने रानी विक्टोरिया को पत्र लिखा-भारत के किसान मेरा प्रोफ़ेसर है। जैविक कृषि से ही मनुष्य सहित जीव प्राणीमात्र निरोगी रह सकते है, परन्तु  समग्र विश्व में रासायनिक कृषि से प्रजा रोग ग्रस्त हो रही है। जस्टस वोन लाइबिग का रासायनिक कृषि का सिद्धांत गलत है। सीक्रेट्स ऑफ़ सॉइल्स नामक पुस्तक में क्रिस्टोफर बर्ड-पीटर टोम्पस्कीन लेखक ने लिखा है-रासायनिक कृषि से  उत्पादित खाद्यान्न के सेवन से 30  प्रतिशत से अधिक युवा नपुंसक हो गए है।  समग्र प्रजा रोग ग्रस्त हो रही है। मधुमेह, कैंसर ,ह्रदय आघात जैसे असाध्य रोग बढ़ते जा रहे है. अभी भी समय है सजीव प्राकृतिक  खेती से उत्पादित खाद्यान्न खाने से मानव जाती निरोगी बना सकते है। हरित क्रान्ति के आगमन के पश्चात भारत में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, फफूंदीनाशकों एवं शाकनाशकों के उपयोग में निरंतर इजाफा होता जा रहा है। 
            विकास के पश्चिमी मॉडल को अपनाकर हमारे अधिकांश कृषक प्रकृति के सह अस्तित्व के सिद्धांत को भूलते जा रहे है एवं स्वअस्तित्व को बनाये रखने  के लक्ष्य में प्रकृति के अपने मित्र घटकों (जल, जंगल, जमीन, पशुधन) को नष्ट करते जा रहे है। परिणामस्वरूप प्रकृति भी अपना विकराल रूप अर्थात सूखा, बाढ़, कीट, रोग आक्रमण, भूकंप आदि मानव जाती को नष्ट करने वाली विभीषकाएं उत्पन्न हो रही है। भूमि, जल तथा वायु का प्रदुषण  इस स्तर पर बढ़ा है कि भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् (ICAR) के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. मंगला राय (भारत सरकार के पूर्व कृषि सलाहकार) को लिखना पड़ा 'रासायनिक खेती से जनजीवन का अस्तित्व खतरे में आया है। अब कुछ वर्षों से भारत सरकार जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है जिसके कारण देश के उच्च वर्ग एवं कुछ मध्यम वर्ग में जैविक खेती के उत्पादों के इस्तेमाल की और रुझान बढ़ा है। उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद  एवं अच्छा भाव मिलने के कारण जैविक कृषि के प्रति किसानों में जागृति पैदा हो रही है।  इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि आने वाला भविष्य जैवक खेती का होगा अर्थात हमें अपने देश में  पुनः प्राकृतिक खेती खेती के सिद्धांतों का अनुपालन करना होगा, तभी समृद्ध, स्वस्थ, आत्मनिर्भर और खुशहाल भारत की कल्पना साकार हो सकती है ।     
कृपया ध्यान रखें:  कृपया इस लेख के लेखक ब्लॉगर  की अनुमति के बिना इस आलेख को अन्यंत्र कहीं पत्र-पत्रिकाओं या इन्टरनेट पर  प्रकाशित करने की चेष्टा न करें । यदि आपको यह आलेख अपनी पत्रिका में प्रकाशित करना ही है, तो लेख में ब्लॉग का नाम,लेखक का नाम और पते का उल्लेख  करना अनिवार्य  रहेगा। साथ ही प्रकाशित पत्रिका की एक प्रति लेखक को भेजना सुनिशित करेंगे।  लेख प्रकाशित करने की सूचना  लेखक के मेल  profgstomar@gmail .com  पर देने का कष्ट करेंगे। 





























फसलों की उपज और गुणवत्ता बढाने अवश्य करे गंधक का इस्तेमाल

                                                  डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर

प्राध्यापक (सस्य्विज्ञान)

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय,

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र,

कोडार रिसोर्ट,कांपा, जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़)

पौधों के लिए आवश्यक पोशाक तत्वों में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश के बाद बाद गंधक चौथा प्रमुख पोषक तत्व है. हमारे देश में बोई जाने वाली प्रमुख तिलहनी फसलों में मूंगफली, सोयाबीन, तिल, सरसों, सूरजमुखी, अलसी आदि  तथा दलहनी फसलों में अरहर, मूंग,  उड़द, चना, मटर, मसूर आदि प्रमुख हैं। इनके अलावा प्याज, लहसुन, मूली, कपास आदि  फसलों में भी गंधक की विशेष जरूरत होती है। एक ही खेत में हर वर्ष इन फसलों की खेती करने से खेतों में गंधक की कमी हो रही है. जिससे फसल की पैदावार व गुणवत्ता में निरन्तर कमी आ रही है। आमतौर पर किसान फसलों में प्रायः गंधक रहित उर्वरक जैसे डी.ए.पी. एवं यूरिया का उपयोग अधिक करते है, जबकि गंधक युक्त उर्वरकों जैसे सिंगल सुपर फास्फेट व जिप्सम का उपयोग प्रायः कम करते है  जिससे खेतों में गंधक की कमीं होने से उत्पादन और गुणवत्ता में गिरावट होती है। राष्ट्रिय एव विभिन्न प्रदेशों में किये गए परीक्षणों से ज्ञात होता है, कि एक किलोग्राम गंधक के प्रयोग से 12 किग्रा गेंहूँ, 5 किग्रा मूंगफली, 7 किग्रा सरसों और 74 किग्रा कंद की बढ़ोत्तरी होती है. गंधक के उपयोग से सरसों में 8.5 %, मूंगफली में 5.1 %, सूरजमुखी में 3.6% और सोयाबीन में 6.8 प्रतिशत तेल में बढ़ोत्तरी होती है।

क्यों जरुरी है गंधक

गंधक कार्बनिक पदार्थों की सरंचना का अभिन्न अंग है. यह पौधों के क्लोरोफिल के निर्माण में सहायक होता है, जो कि पौधों के लिए अत्यंत आवश्यक है. पौधों की वानस्पतिक वृद्धि और जड़ों के विकास में भी गंधक सहायता करता है।तिलहनी फसलों में गंधक के उपयोग से दानों में तेल की मात्रा में बढोतरी होती है, साथ ही दाने सुडौल व चमकीले बनते है तथा पैदावार अधिक प्राप्त होती है। इसी प्रकार दलहनी फसलों में प्रोटीन के निर्माण के लिए गंधक अतिआवश्यक पोषक तत्व हैं. गंधक से दलहनी फसलों में भी दाने सुडौल बनते हैं व पैदावार बढ़ती है। यहीं  नहीं, दलहनी फसलों की जडो में ग्रंथियों के निर्माण में गंधक मदद करता है जिससे राइजोबियम जीवाणुओं की क्रियाशीलता को बढ़ावा मिलता है।

गंधक की कमीं के लक्षण

मृदा में गंधक की कमिं होने के साथ ही पौधों पर लक्षण दिखाई देने लगते है. ये लक्षण विभिन्न फसलों में अलग-अलग होते है। गंधक की कमिं के लक्षण सर्प्र्थम नविन पत्तियों पर दिखाई देते है, ये पत्तियां पीली पड़ने लगती है और पौधों की बढ़वार अवरुद्ध हो जाती है। तना पतला और बौना दिखाई देता है। इसकी कमीं के लक्षण नाइट्रोजन की कमिं के लक्षणों से मिलते-जुलते है। नाइट्रोजन के अभाव में पुरानी  पत्तियां हरी बनी रहती है, जबकि गंधक की कमीं से नई पत्तियां पीली पड़ जाती है तथा पुरानी पत्तियां हरी बनी रहती है.अधिक कमीं के कारण पूरा पौधा पीला पड़ जाता है। खाद्यान्न फसलों में गंधक की कमीं से परिपक्वता की अवधि बढ़ जाती है। पौधों की पत्तियों का रंग हरा रहते हुए भी बीच का भाग पीला हो जाता है। दलहनी और तिलहनी फसलों में गंधक की कमीं के लक्षण अधिक उभरते है।सरसों वर्गीय फसलों में गंधक की कमीं के कारण फसल प्रारंभिक अवस्था में पट्टी का निचला भाग बैंगनी रंग का हो जाता है।

गधंक के प्रमुख स्रोत एवं उपयोग 

उर्वरक का नाम

उपलब्ध पोषक तत्व की प्रतिशत मात्र

सिंगल सुपर फॉस्फेट

फॉस्फोरस-16, सल्फर-12 एवं कैल्शियम-21 %

जिप्सम

23% कैल्शियम, 18 % सल्फर

जिंक सल्फेट

जिंक 12% एवं सल्फर 11-18 %

फेरस सल्फेट

आयरन-19 % एवं सल्फर-12%

पोटैशियम सल्फेट

पोटाश-50% एवं सल्फर-18 %

अमोनियम सल्फेट

नत्रजन 21 % तथा  सल्फर 24  %

पायराईट

22-24 % सल्फर, 20-22 % आयरन,

विभिन्न फसलों में गधंक की मात्रा

फसल का नाम

मात्रा किग्रा प्रति हेक्टेयर

दलहनी फासले (चना, मटर,मसूर)

15-20

तिलहनी फसलें (मूंगफली, टिल, सरसों,अलसी आदि)

25-30

प्याज, लहसुन, आलू आदि

30-40

टमाटर व अन्य सब्जियों में

15-20

फसलों में गंधक के उपयोग का समय इसके स्त्रोत पर निर्भर करता है। जब गंधक उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाये तो सभी फसलों के लिए उसे खेत की अंतिम जुटी के समय इस्तेमाल करना चाहिए। गंधक युक्त उर्वरकों को बारीक पाउडर के रूप में खेत में फसल बुवाई के 20-25 दिन पहले मिला देना अधिक अच्छा होता है। मूंगफली में फली बनते समय, गंधक की पर्याप्त आपूर्ति के लिए गंधक को दो भागों में (बुवाई व फली बनते समय) बराबर मात्रा में बांटकर देना लाभदायक होता है। यदि किसान भाई अमोनियम सल्फेट, सिंगल सुपर फॉस्फेट, पोटैशियम सल्फेट जैसे उर्वरकों का प्रयोग करते है तो अलग से सल्फर युक्त उर्वरक देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।

हरित क्रांति के बाद अधिक उत्पादन और मुनाफा कमाने के उद्देश्य से  खेतो में बेतहासा व असंतुलित रसायनिक खाद को डाल कर भूमि की उर्वरा शक्ति को नुक़सान पहुँचाया है सघन कृषि में अधिकांश किसान यूरिया, डी. ए. पी. जैसे उर्वरको का अधिक इस्तेमाल करते आ रहे है जिससे गंधक, कैल्शियम सहित अनेक सूक्ष्म तत्वों की भूमि में कमीं परिलक्षित होने लगी है इससे फसलोत्पादन और फसल उत्पाद की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ रहा है अतः मृदा उर्वरता को बरकरार रखने के लिए आवश्यक है कि किसान खेतों की मिट्टी परीक्षण कराने के उपरान्त पोषक तत्वों की सही एवं संतुलित मात्रा का उपयोग करें फसलोत्पादन के लिए आवश्यक नत्रजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश के साथ-साथ सल्फर तत्व का भी उपयोग करे दलहनी, तिलहनी फसलों से अधिकतम  उत्पादन के साथ साथ में प्रोटीन एवं वसा की मात्रा बढाने के लिए उर्वरकों में गंधक का उपयोग आवश्यक है

















सोमवार, 15 जून 2020

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, महासमुन्द (छत्तीसगढ़)

डॉ.गजेन्द्र सिंह तोमर,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय एवं अनुसन्धान केंद्र, कांपा, महासमुंद (छत्तीसगढ़)


छत्तीसगढ़ में कृषि शिक्षा, शोध एवं प्रसार गतिविधियों के सुचारू संचालन के लिए रायपुर में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना 1987 को हुई. राज्य गठन के पूर्व इस विश्वविद्यालय में एक कृषि महाविद्यालय, एक दुग्ध प्रोद्योगिकी महाविद्यालय, रायपुर तथा एक पशुपालन महाविद्यालय संचालित किये जा रहे थे. राज्य गठन के पश्चात  प्रदेश के चहुमुखी विकास के साथ-साथ कृषि शिक्षा, शोध एवं विस्तार गतिविधियों का तेजी से विकास हुआ. वर्तमान में इस कृषि विश्वविद्यालय के अन्तर्गत 30  कृषि महाविद्यालय ( 21 विश्वविद्यालय के घटक एवं 9 विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त), 6 उद्यानिकी महाविद्यालय (2 घटक एवं 2 निजी क्षेत्र) के अलावा 4 कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय ( 2 घटक एवं 2 निजी क्षेत्र) कुल 40 महाविद्यालय आते है. कृषि महाविद्यालय रायपुर में कृषि स्नातक स्तर की शिक्षा के साथ-साथ अनेक विषयों में स्नातकोत्तर एवं पी.एच.डी. स्तर की शिक्षा और उपाधि प्रदान की जाती है. छोटे से राज्य छत्तीसगढ़ में 40 महाविद्यालय एवं 30 कृषि विज्ञान केन्द्रों का संचालन किया जा रहा है. कृषि शिक्षा, कृषि अनुसन्धान और कृषि प्रसार के क्षेत्र में यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख   कृषि विशेविद्यालयों में शुमार है.

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के घटक  कृषि, उद्यानिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय

1

कृषि महाविद्यालय ,कृषक नगर , रायपुर

UG, PG and Ph.D.

1961-62

2

स्वामी विवेकानंद कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कृषक नगर, रायपुर

UG, PG and Ph.D.

1996-97 (PG,Ph.D.);2013-14 (UG)

3

ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, सरकंडा, बिलासपुर

UG, PG

2001-2002(UG), 2015-16(PG)

4

राजमोहिनी देवी कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, अजिरमा, अम्बिकापुर, सरगुजा

UG, PG

2001-2002(UG), 2015-16(PG)

5

शहीद गुण्डाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कुम्हरावन्ड, जगदलपुर,

UG, PG

2001-2002(UG), 2015-16(PG)

6

संत कबीर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कवर्धा

UG

2007-2008

7

भवानीलाल रामलाल साव मेमोरियल कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, पंडरिया रोड, मुंगेली

UG

2007-2008

8

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जांजगीर-चांपा

UG

2011-2012

9

पं. किशोरी लाल शुक्ला उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, राजनांदगांव

UG, PG

2011-2012

2017-18(PG)

10

दाऊ कल्याण सिंह कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, खपराडीह, भाटापारा

UG

2012-2013

11 

पं. शिव कुमार शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, राजनांदगांव

UG

2013-2014

12

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, बोईरदादर फार्म, रायगढ़

UG

2013-2014

13

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, प्रथम तल, शासकीय गर्ल्स कालेज, ओड़गी नाका, बैकुण्ठपुर, कोरिया

UG

2013-2014

14

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, शासकीय बालक हायर सेकेण्डरी स्कूल के पास, बेमेतरा

UG

2013-2014

15

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, न्यू गर्ल्स कालेज बिल्डिंग, अलबेला पारा, कांकेर

UG

2013-2014

16

उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कुम्हरावण्ड फार्म, जगदलपुर

UG

2013-2014

17

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, नारायणपुर

UG

2018-2019

18

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, गरियाबंद

UG

2018-2019

19

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कुरुद

UG

2018-2019

20

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कोडार मोटेल,कांपा,महासमुंद

UG

2018-2019

21

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, छुईखदान, राजनंदगांव

UG

2018-2019

22

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जशपुर

UG

2018-2019

23

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, कोरबा

UG

2018-2019

24

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, मर्रा, पाटन, जिला दुर्ग

UG

2019-20

25

कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, मुर्रा, साजा, जिला दुर्ग

UG

2019-20

       इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त निजी कृषि, उद्यानिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय

क्रमांक

महाविद्यालय का नाम

पाठ्यक्रम

स्थापना वर्ष

1

भारतीय कृषि महाविद्यालय, पदमनाभपुर, पुलगांव चौक, दुर्ग

UG

2001-2002

छत्तीसगढ़ कृषि महाविद्यालय, रिसाली (भिलाई) धनोरा रोड, पो.-हनौदा, जिला-दुर्ग

UG

2001-2002

3

दन्तेश्वरी उद्यानिकी महाविद्यालय, मनोपचार हास्पिटल के पास, माना बस्ती, रायपुर

UG

2001-2002

महामाया कृषि महाविद्यालय, नगरी रोड़, ग्राम-सियादेही, पो.- अरौद, धमतरी

UG

2001-2002

5

भोरमदेव कृषि महाविद्यालय, ग्राम-घुघरी कला, खुटु नर्सरी के पास, कवर्धा, जिला कबीरधाम

UG

2002-2003

6

मार्गदर्शन संस्थान कृषि महाविद्यालय, रिंग रोड, चोपड़ा पारा, अम्बिकापुर, जिला-सरगुजा

UG

2002-2003

7

श्रीराम़ कृषि महाविद्यालय,श्रीराम परिसर,ग्राम-ठाकुर टोला, पो.-सोमनी, , राजनांदगांव

UG

2002-2003

गायत्री उद्यानिकी महाविद्यालय, गोकुलपुर, रूद्री रोड, धमतरी

UG

2002-2003

9  

के.एल. उद्यानिकी महाविद्यालय, गुण्डदेही रोड, पोटियाडीह, धमतरी

UG

2002-2003

10 

रानी दुर्गावती उद्यानिकी महाविद्यालय, मेढुका, वि.ख.-गौरेला, तह.-पेन्ड्रा रोड, बिलासपुर

UG

2002-2003

11

भारतीय कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पदमनाभपुर, पुलगांव चैक, दुर्ग

UG

2002-2003

12

छत्तीसगढ़ कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय,रिसाली (भिलाई) धनोरा रोड,पो.-हनौदा,जिला-दुर्ग

UG

2002-2003

13

कृषि महाविद्यालय, चिल्हाटी रोड, अम्बागढ चैकी, जिला-राजनांदगांव

UG

2003-2004

14

कृषि महाविद्यालय,चिता लंका, कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने, दन्तेवाड़ा

UG

2003-2004

15

कृषि महाविद्यालय, जोरापाली (केनापाली) रोड़, रायगढ़

UG

2003-2004

 
कृषि महाविद्इंयालय एवं अनुसंधान केंद्र, कांपा, जिला महासमुंद  
                      इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के अधीन शासकीयकृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कांपा, जिला महासमुन्द वर्तमान में पर्यटन विभाग के कोडार रिसोर्ट में संचालित किया जा रहा है। ज्ञात हो इस महाविद्यालय के  उदघाटन तत्कालीन कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल के कर कमलों से कोडार रिसोर्ट, कांपा जिला महासमुन्द में 1 अक्टूबर, 2018 को सम्पन्न हुआ ।
रायपुर-सरायपाली राष्ट्रिय राजमार्ग स्थित ग्राम कांपा कोडार मोटल, कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र 
नवोदित महाविद्यालय के लिए उपयुक्त भवन एवं प्रयोगशाला की सुविधा न होने के कारण  वर्ष  2018-19 सत्र में बी एस सी (कृषि) प्रथमवर्ष में 24 छात्रों को प्रवेश देकर रायपुर स्थित कृषि महाविद्यालय में इस नवीन महाविद्यालय का शुभारंभ हुआ । जुलाई 2020 में कलेक्टर महासमुंद ने शिक्षा विभाग के डाइट भवन में अस्थाई तौर पर कृषि महाविद्यालय संचालित करने की सहमति प्रदान कई गई तदनुरूप जुलाई 2020 से सत्र 2019-20 में प्रथम एवं द्वितीय वर्ष की कक्षाएं नियमित रूप से उक्त भवन में संचालित होने लगी. कृषि स्नातकों की कक्षाएं, प्रयोगशाला, कृषि प्रयोग हेतु कृषि भूमि, प्राध्यापकों के बैठने की उचित व्यवस्था नहीं होने की वजह से  कृषि महाविद्यालय के छात्रों एवं कृषि शोध में व्यवधानहो रहा था. इसे देखते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं जिला प्रसाशन के सहयोग से राष्ट्रिय राजमार्ग स्थित पर्यटन विभाग का कोडार रिसोर्ट, कांपा (महासमुंद) महाविद्यालय को उपलब्ध हो गया है. तदनरूप सत्र 2020-21 से यह महाविद्यालय  उक्त भवन में संचालित किया जा रहा है. कोविड-19 संक्रमण के कारण अप्रैल 2020 से शैक्षणिक गतिविधियाँ स्थगित है.
 
गणतंत्र दिवस 26.01.2020 के अवसर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम 
 जुलाई 2020 से यह महाविद्यालय महासमुन्द स्थित शिक्षा विभाग (डाइट) भवन में स्थानांतरित हो गया तथा कुल 50 छात्र-छात्राओं के साथ प्रथम व द्वितीय वर्ष की कक्षाएं प्रारम्भ हुई।
कृषि महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा खेल-कूंद प्रतियोग्यता में उच्च प्रदर्शन करने पर पदक प्राप्त करने के पश्चात प्राध्यापकों के साथ फोटो 
देश मे फैली कोविड-19 महामारी के कारण द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षाएं रद्द कर दी गई । छात्र-छात्राओं को प्राध्यापक अपने-अपने विषय में ऑनलाइन मार्गदर्शन दे रहे है. 
 फोटो-कृषि महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.एस.के.पाटिल 

कृषि महाविद्यालय को छत्तीसगढ़ शासन ने ग्राम  कांपा में राष्ट्रीय राजमार्ग से लगी हुई 87 एकड़ पड़ती भूमि आवंटित की  है जिसमें महाविद्यालय भवन, छात्रावास एवं प्रोफेसर्स-कर्मचारियों के लिए भवनों का निर्माण होना है तथा शेष भूमि को विकसित कर कृषि शोध कार्य किया जाएगा।मा कोविड-19 महामारी के कारण उक्त कृषि प्रक्षेत्र का विकास कार्य धीमी गति से चल रहा है. महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना के तहत खेत-नाली निर्माण का कार्य संपन्न किया जा रहा है. कृषि भूमि में तार घेरा का कार्य प्रारम्भ है साथ ही खरीफ फसलों की बुवाई एवं फल-फूल एवं शोभाकारी वृक्षों का रोपण कार्य भी किया जा रहा है. 
फोटो-कृषि महाविद्यालय को ग्राम  कांपा, जिला महासमुंद में छत्तीसगढ़ शासन द्वार  आवंटित कृषि  भूमि का मुआयना करते हुए विश्विद्यालय के कुलपति डॉ.एस.के.पाटील, निदेशक विस्तार डॉ.मुखर्जी, अधिष्ठाता डॉ.राठोर एवं प्रोफ़ेसर जी.एस.तोमर